Arrun Pratik Tiwari (The Story-teller...)

Arrun Pratik Tiwari (The Story-teller...)
Prem Kahaniya...

Tuesday, 28 January 2014

पहला प्यार


बारिश के दिन थे, जोर की बारिश हो रही थी. माँ ने सुबह ही कहा था,
'' ज़ोया छाता लेकर जाना, अभी बारिश हो तो नहीं रही है लेकिन शायद हो सकती है और हाँ अगर आज फिर दोस्तों के साथ भीगते हुए आई तो तेरे अब्बू से तेरी शिकायत कर दूंगी और कल वही भीगे हुए कपडे पहन के जाना स्कूल, मैं नहीं दूंगी धुले हुए कपडे.''
             माँ की यह हिदायत मैंने एक कान से सुनी और दुसरे से निकाल दी थी. मैंने सोचा, अरे अभी हलकी धूप निकली है बारिश कहाँ होगी, अम्मी का तो काम है चिंता करना और बेवज़ह धमकाना; उन्होंने तो तब भी धमकाया था जब मैं सहेलियों के साथ बिना घर बताये सिनेमा देखने चली गई थी और जाती भी क्यों न ? लव स्टोरी थी. मुझे बचपन से ही शौक है प्यार पर बेस्ड फिल्मे देखने का. लेकिन मेरी निजी ज़िन्दगी में आज तक मुझे कभी किसी से प्यार हुआ ही नहीं और होता भी कैसे ? अब्बा जान ने छोटे से लेकर आज तक केवल लडकियों के स्कूल में ही दाखिला करवाया और आज जब मैं कॉलेज में पढ़ती हूँ तो वो भी वीमेन्स कॉलेज है. कभी किसी अजनबी से मुलाकात ही नहीं हुई जो इतना अच्छा लगे जैसे मैंने अपने सपने में सोच रक्खा हो. हाँ और जो मुझे आस पड़ोस, बाज़ार- मोहल्लों में मिले तो उनकी मेरी कभी बात ही नहीं बनी.
पों...पों...बस का हॉर्न बजा और मैं खयालों के राजकुमार के ख्याल से निकली. मेरी बस आ गई थी जिससे मुझे घर लौटना था यहाँ तो मुझे छाते की खास ज़रूरत नहीं थी लेकिन घर से आधा किलोमीटर दूर मेन रोड पर उतरती तो वहां से भीगते हुए पैदल जाने का डर अभी से मुझे सताए जा रहा था...मैं जल्दी से धक्का मुक्की करती हुई बस में चढ़ गई. मुझे पब्लिक ट्रांसपोर्ट की आदत हो चुकी थी हालांकि पहले ऐसा नहीं था. गनीमत से एक सीट मिल गई और मैं झट से उस सीट पर बैठ गई. कुछ देर बाद कंडक्टर आया और टिकट बनाने लगा. मैंने उसे अहमदनगर का टिकट बनाने के लिए कहा और पैसे निकालने लगी. अचानक मेरा हाथ भीगे पर्स पर गया और फिर गीले नोटों पर; मेरे तो होश उड़ गए. दरअसल, बस स्टॉप पर तो मैंने खुद को भीगने से बचा लिया था मगर एक पतली थी पानी की धार टीन के छोर से गिरती हुई मेरे कॉलेज बैग को भीगा रही थी जिससे मेरे कॉपी किताब के साथ मेरे पैसे भी भीग गए थे. मैं एक पल को सहम गयी. मुझे लगा आज कंडक्टर की झिड़की सुननी पड़ेगी. जैसे ही मैंने भीगे नोट कंडक्टर को बढ़ाये वो बोला, "मैडम जी, सूखी सीट पर बैठी हो और गीले नोट दे रही हो''...सुनकर सभी हंसने लगे.
मुझे बहुत शर्म आई. मैं भी थोड़े गुस्से में बोली, "लेना हो तो लो, मेरे पास तो भीगे नोट ही हैं, अब तुम्हारे लिए नोट को सुखा के लाऊं क्या ?
''नहीं जी, मैं गीले नोटों का क्या करूँगा? दुसरे नोट दो''
हमारी बक-झक हो रही थी कि 20 का नोट पकड़ा हुआ एक हाथ और कड़कती आवाज़ मेरे से होकर गुज़री,
"ले भईया और टिकट बना, ज़्यादा मगज़मारी करने की ज़रूरत नहीं है." मैंने ध्यान नहीं दिया कि मेरे बगल की सीट पर एक गोरा चिट्टा सा हीरो टाइप लड़का बैठा था. चेहरे से लोफ़र लगने वाला लड़का इतने अच्छे दिल का था, आज तक मैंने सोचा भी नहीं था. अच्छा था, सुन्दर, चेहरे पर चमक थी, बाल बड़े करीने से संवारे थे लेकिन खिड़की के पास बैठने के चलते हवा के तेज़ झोंके के कारण बाल चेहरे पर तितर-बितर हो गए थे. मैंने उसे धन्यवाद दिया और खामोश हो गयी.
                कुछ देर बाद चुप्पी उसने ही तोड़ी. जैसे सब पूछते हैं उसने भी पूछा,"जी आपका नाम क्या है ?
"ज़ोया...ज़ोया परवीन..." मैं सोचते और अटकते हुए बोली.
"जी मेरा नाम है साहिल हुस्सैन...मैं अहमदनगर से पहले वाले मोहल्ले में रहता हूँ आपको तो अहमदनगर जाना हैं ना? अभी कारीगर हूँ आपके कॉलेज से अगले वाले कट के पास हैंडलूम का कारखाना है उसी में...आप कौन सी क्लास में हैं? कौन सा इयर है? वह धड़ाधड़ अपने बारे में बताता गया और मुझसे सवाल पूछता गया. मैं सोच में थी कि यह कैसे जानता है कि मैं कॉलेज में पढ़ती हूँ और क्या यह अपने 20 रूपये की मदद के बदले में बस में मेरा दिमाग खाना चाहता है ? मुझे ऐसे लोग पकाऊ लगते हैं जो बेमतलब के ताबड़तोड़ बोलते जाएँ.
''जी फाइनल इयर में हूँ'' ,मैंने बस इतना सा जवाब दिया.
"मैंने बस दसवी तक पढाई की है, अब्बा की लम्बी बीमारी में मौत हो गई इसीलिए बीच में पढाई छोडनी पड़ी. लेकिन मैं अभी खुश हूँ, अपना काम करके पैसे भी कमा रहा हूँ और रोज़ी रोटी के लिए हुनर भी सीख रहा हूँ. ये पढाई कर के लोग क्या करते हैं? कुछ भी तो नहीं, वही रटी-रटाई बातें पढ़ते हैं, बाबर अकबर का बाप और अकबर हुमायूं का बाप था...यार इससे पेट थोड़े न भरेगा, इससे पैसे थोड़े न मिलेंगे. पैसा तो काम और हुनर सीखने से ही मिलेगा और रोटी पैसे से ही मिलेगी और भूख तो रोटी से ही मिटती है न मैडम, नाकि देश की जनसंख्या और क्षेत्रफल याद करने से और इतिहास-भूगोल पढने से.”
चों...एकाएक बस का ब्रेक लगा, सभी लोग आगे की सीट के तरफ झुक गए, मुझे तो ऐसा लगा जैसे मेरी नाक आगे की सीट से टकराकर बीच में टूट गई. बहुत गुस्सा आया, सीटों पर बैठे कई लोगों ने ड्राईवर को ब्रेक लगाने पर गालियां भी बकीं
''जाम...फिर जाम...बताइए लोगों को थोड़ी सी भी तमीज़ नहीं है, बच्चे पर बच्चा पैदा कर रहे हैं, जनसंख्या बढ़ा रहे हैं. तो भुगतो...अब वे बच्चे बड़े होंगे और अपनी गाड़ियां लेकर सडकों पर निकलेंगे तो जाम तो लगेगा ही.'' वह भी बोलते-बोलते अचानक रुक गया, मुझे लगा कि बस के जैसे उसक मुंह में भी ब्रेक लग गया. थोडा गंभीर होता बोला," वैसे मैं भी छः भाई-बहन हूँ.''
और वह ठहाका लगाकर हंसने लगा. मैं भी अपनी हंसी नहीं रोक पाई. इसके बाद मुझे भी उसके बातों में दिलचस्पी आने लगी. बातों-बातों में कब आठ किलोमीटर लम्बा रास्ता कट गया, मालूम नहीं चला. जब मैं बस से उतरी तो ग़नीमत से बारिश रुक गई थी. मुझसे वह दुआ सलाम और फिर मिलने का वादा करके चला गया. लेकिन मेन रोड से घर तक आने वाले रास्ते में मेरे दिमाग़ में उसकी ही बातें ही घुमती रहीं. कितना खुला और आज़ाद था वह; मन से भी और बातों से भी. आई लाइक इट!! बात-बात पर मुझे उस बेमतलब की मगर इंटरेस्टिंग बकवास में शामिल करते हुए ठहाके लगाना, आई लाइक इट! घर पहुँची और अपने रोजाना के कामों में बिजी हो गई फिर कभी उसका ख्याल ही नहीं आया.
                                   एक दिन मैं घर पर चल रही ईद की तैयारियों के चलते थोड़ी लेट हो गई. स्टॉप पर गयी तो बस जा चुकी थी. अब अगले बस के लिए मुझे लगभग एक घंटे का इंतज़ार करना था. मैं इस पशोपेश में थी कि घर लौट जाऊं या कॉलेज जाऊं. तभी एक स्कूटर मेरे पास आकर रुका.
"मैडम जी, एक सवारी...फ्री में...गवर्नमेंट गर्ल्स कॉलेज...चलेंगी क्या?''
यह क्या यह तो वही लड़का था जो मुझे बस में मिला था करीब 5-6 महीने पहले. नाम था साहिल.
''अरे आप, यहाँ कैसे और मुझे पहचान लिया ?'' मैं चिहुकते हुए बोली.
"मैडम, भूल गईं, बताया तो था, यहीं सड़क से नीचे की गली में रहता हूँ, चलिए आपको आपके कॉलेज छोड़ देता हूँ अभी दो महीने ही हुए सेकंड हैण्ड खरीदी है, कैसी है ?'' वह स्कूटर की एक्सेलरेटर घुमाता हुआ बोला.
''नहीं, मैं चली जाउंगी, अभी बस आती ही होगी, वैसे भी मैंने उस दिन का वो बीस रुपया आपको नहीं दिया है...एक मिनट रुकिए मैं अभी आपको देती हूँ.'' ,मैं दुपट्टे को संभालती हुई और अपने बैग से हैण्ड पर्स निकालते हुए बोली.
''मैडम, यह क्या कर रहीं हैं, मुझपर पाप मत चढ़ाइए. एक घंटे में आएगी बस...चलिए छोड़ देता हूँ, रमज़ान का महिना है सोचा दुआएं भी कमा लूँ '' वह थोडा सीट पर थोडा आगे की ओर सरकता हुआ बोला मानो मैं उसके पीछे बैठ ही रही हूँ.
                               मैंने भी ज्यादा सोचने समझने की जगह क्या पता किस विश्वास से एक अनजान लड़के के गाडी पर बैठ गई. आज पहली बार मैं किसी लड़के के इतना क़रीब बैठी थी. अजीब सी सिहरन और डर मेरे अन्दर बैठा जा रहा था. उस दिन की तरह वह आज भी बोले जा रहा था, हँसे जा रहा था और मैं चुपचाप उसकी हाँ में हाँ मिलाती जा रही थी. बातों-बातों में मेरा कॉलेज आ गया और वह मुझे उतार कर जाने लगा. उसने मुझे बाय बोला और शाम को मिलने का वायदा करके अपने काम पर चला गया. सच बताऊँ, वह आज बहुत सुन्दर लग रहा था. काली कमीज़ उस पर क्या फब रही थी मानो उसने पहले से  ही काला रंग सोच के पहना हो कि उसकी शख्सियत को देख किसी की नज़र न लगे...मैं क्यों सोच रही हूँ उसके बारे में; खुद को झंकझोरती हुई मैं कॉलेज में चली गई और
पुरे दिन मैं उलझी सी रही और सोचती रही कि कब शाम हो और फिर उससे मुलाक़ात हो ...अरे! मुझे उसका क्यों इंतज़ार है ? ना मैं उसे जानती हूँ, ना मैं उसे पहचानती हूँ, मेरे दिमाग़ ने मुझसे कहा. फिर दिल ने ख़िलाफ़त की, अरे! मैं झूठ बोल रही हूँ खुद से..मैं उसे जानती हूँ कि उसका नाम साहिल है और वह अच्छा लड़का है और पहचानती भी हूँ कि वह बहुत ही सुन्दर और लम्बे कद का लड़का है.
                             शाम पांच बजे अपने लेक्चर्स, मेहंदी और डांस का क्लास निपटा कर जब मैं सहेलियों के साथ बस स्टॉप पर आई तो सहेलियों के हंसी- मज़ाक के बीच भी मेरा मन कहीं और ही घूम रहा था. मेरी नज़र को किसी चीज़ की तलाश थी...शायद स्कूटर की क्योंकि कोई भी स्कूटर सड़क से होकर गुज़रता तो मेरा ध्यान उधर को चला जाता. एक स्कूटर तेज़ी से मेरी तरफ़ बढ़ा और मेरी आँखे चमक उठीं. वह...मतलब साहिल आ रहा था.
"मैडम जी चलिए'' ,वह स्कूटर को रोकता हुआ ऐसे बोला जैसे की यह उसका फ़र्ज़ हो और मैं भी फुर्ती से स्कूटर पर बैठ गई जैसे कि यह मेरा अधिकार हो.
"मैडम जी, मुझे मेरी तनख्वाह मिली है और मुझे घुमने का मन है, अगर आप मेरे साथ चलेंगी तो अच्छा लगेगा और मुझे ख़ुशी भी होगी कि कोई तो है जो मेरी बकवास भी हंस-हंस के सुनता है. चलेंगी ना मैडम जी" ,वह स्कूटर को हवा में उडाता हुआ बोला.
"ये मैडम-मैडम क्या लगा रखा है मेरा नाम ज़ोया है मुझे ज़ोया बुलाइए, ठीक है ?", मैं थोडा गुस्से से बोली.
''सॉरी जी, मतलब ज़ोया जी.
मैं चुपचाप उसका साथ देती गई और वह बोलता गया और बताता गया अपने बारे में. मैं भी बोलती थी और अपने बारे में बताती थी मगर बहुत कम क्योंकि उसके बोलने की रफ़्तार में ख़ुद के लिए पनाह खोजना बड़ा मुश्किल था. हम कई जगहों पर घुमे, खूब खाया-पीया और बातें भी की. यह पहली बार था जब मैं किसी लड़के के साथ कही घुमने आई थी हालांकि सबकुछ पहली बार ही हो रहा था मेरी ज़िन्दगी में. क़रीब सात बजने को हुए तो मेरी ज़िद पर हम घर लौटने लगे. रास्ते में मालूम चला कि उसके गाँव पर पड़ोसियों ने कब्ज़ा कर लिया है और उसके खालाजान को पीट कर भगा दिया है इसलिए वह गाँव जा रहा है. मैं रोड पर, जहाँ से मैं पैदल जाती थी, उतर गई और घर जाने को हुई वैसे घर जाने का तो मन नहीं कर रहा था मगर अब्बू ने घर पर फ़ोन ज़रूर किया होगा और उन्हें मालूम चल गया होगा कि मैं अभी कॉलेज से घर नहीं लौटी हूँ क्योंकि वो दुकान से रात को नौ बजे आते थे सो बीच में शाम को पक्का फ़ोन कर लेते थे.
" ज़ोया जी ...ज़रा रुकिए...यह कलम रखिये मैं आपको तोहफ़ा दे रहा हूँ, बहुत दिनों से संभाल के रक्खा था. मैंने इसे तब ख़रीदा था जब मैं दसवीं में था, सोचा था ग्यारहवी में इसी से लिखूंगा लेकिन मैं तो लिख नहीं पाया, आप ले लीजिये. यह आपके पास रहेगा तो दो फ़ायदे होंगे एक तो इसका इस्तेमाल भी हो जायेगा और दूसरा इसी बहाने आप इस बातूनी को याद कर लेंगी.''
वह चुप हो गया. मैंने सोचा मैं कुछ बोलूं और मैं अभी बोलने ही वाली थी कि
''मैडम जी...वो सॉरी...ज़ोया जी, एक बात और मुझे बहुत अच्छी अंग्रेज़ी नहीं आती लेकिन इतना तो जानता हूँ इसलिए आपसे कहना चाहता हूँ, कि आप बहुत अच्छी हैं,
आई लाइक यू '', वह अपनी निगाहों को नीचे झुकाता हुआ बोला.
मैं भी अपने मन में कुछ ऐसा ही सोच रही थी.
''मैडम जी चलता हूँ कुछ सामान ख़रीदने हैं, कल सुबह ही घर निकलूंगा, ख़ुदा हाफ़िज़, ऊपर वाले ने चाहा तो आपसे ज़रूर मिलूँगा''
फिर पहले की तरह मेरे बोलने से पहले और कुछ कहने से पहले उसका स्कूटर आगे बढ़ गया. और, मैं उससे निकले धुएं को देखती हुई खुद को समझाने और उससे अपने मन की बातें कहने की नाक़ाम कोशिश कर रही थी.
                                       
                                                                      -   © अरुण तिवारी ‘प्रतीक’




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