Arrun Pratik Tiwari (The Story-teller...)

Arrun Pratik Tiwari (The Story-teller...)
Prem Kahaniya...

Thursday, 13 February 2014

ये मोहब्बत



अभी-अभी रोहित ने गोरखपुर के एक मशहूर कॉलेज सेंट एंड्रूज में स्नातक में दाखिला लिया था. नया कॉलेज, नए लोग और नयी जगह सब कुछ उसे बड़ा अच्छा और सुन्दर लगता था. हाँ, अभी उसके कॉलेज में बहुत दोस्त नहीं थे और अभी वह ज़्यादा दोस्ती करने के मिज़ाज में भी नहीं था क्योंकि जब उसे गाँव से भेजा गया था तो माँ-पिता जी ने सख्त हिदायत दी थी कि शहर के लड़कों से दोस्ती-यारी कम ही रखना. क्योंकि गाँवों में यह आम सोच है कि शहर के लड़के-लड़कियां और वहां की आबो-हवा नए-नए गए गाँव के लड़कों को बिगाड़ देती है. रोहित गाँव से पहली बार शहर गया था सो उसे इस बात का विशेष ख्याल रखना था कि किसी शहरी की बुरी नज़र न लग जाये. गाँव का होने के चलते उसके रहन-सहन और बोल-चाल में ठेठ देहातीपन झलकता था. यह बात जींस-टीशर्ट वालों के लिए हंसी-मज़ाक का विषय बनती थी. रोहित को शुरुआती दिनों में बड़ी दिक्कत हुई और कई बार उसे सबके सामने ज़लील होना पड़ा. जब रोहित ख़ुद को देहाती पुकारे जाने से तंग आ गया तो उसने ख़ुद को शहरी रंग-ढंग के हिसाब से ढालने में ही अपनी भलाई समझी. वह शहरी मिज़ाज में कपड़ों और बोल-चाल से तो बदल गया लेकिन उसके मन और दिमाग़ अभी भी गाँव के जैसे संस्कारिक और कोमल बने रहे.
                         एक साल बीत जाने के बाद रोहित अपनी जीतोड़ मेहनत के चलते अपने क्लास के तेज़ विद्यार्थियों में शुमार होने लगा. इस सफलता से ख़ुश होकर उसके पिता जी ने उसे एक नया मोबाइल दिलाया. नया मोबाइल और उसका उस दौर में बढ़ता चलन और ज़रूरतें, रोहित के लिए सब कुछ एक सपने के जैसा था. अब उसके कई दोस्त थे और वह उनके साथ ख़ुश था लेकिन एक दिन ऐसे ही दोस्तों के बीच हो रही गपशप ने रोहित के एक बात सोचने पर मज़बूर कर दिया. हुआ यों कि उसके पांच दोस्तों की मंडली में से एक दोस्त ने रोहित से एक चीज़ के बारे में बात छेड़ी जिसके बारे में उसने कोई ख़ास ध्यान ही नहीं दिया था.
“अच्छा रोहित, ये बता कि यार तेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है? क्योंकि तुझसे कई बार पूछ चुके और तू बात घुमा-फिरा देता है.” ,उसके एक दोस्त सन्नी ने पूछा.
“अबे होगी ये हमें बताना नहीं चाहता वरना हम इसे उससे मिलाने के लिए ज़िद करेंगे न इसलिए.” ,एक और दोस्त बोला.
“हो सकता है कोई थी और उससे इसका ब्रेकअप हो गया होगा, हा...हा...हा...” दूसरा दोस्त हँसता हुआ बोला.
“अरे नहीं यार, मुझे इन सब चीजों में यकीन नहीं है और मैं प्यार करना भी नहीं चाहता क्योंकि मैंने फ़िल्मों में देखा है उन्हें कितनी दिक्कतें उठानी पड़ती है और ये सब बेकार की चीज़ें हैं इसमें केवल समय की बर्बादी है और कुछ नहीं.” ,रोहित सबका एक बार ही जवाब देता हुआ बोला.
“हाँ भई, जब मिला नहीं तो अंगूर खट्टे ही होंगे.” ,युवराज चुटकी लेता हुआ बोला.
“अच्छा सुन, अगर तुझे कभी लगे कि तेरा मन भी कभी-कभी अपने किसी ख़ास से अपनी फीलिंग्स बताने के लिए करता है लेकिन तू बता नहीं पता क्योंकि वो ऐसी भावनाएं होती हैं जो तू अपने मम्मी-पापा या हम दोस्तों से बताने में हिचकिचाता है तो मुझे संपर्क कर लेना, तुम्हारा लव-गुरु दोस्त हमेशा हाज़िर रहेगा.” ,सन्नी थोड़ा सा गंभीर होता हुआ बोला.
“अबे, हम तो भूल ही गए थे अपने कॉलेज का लव-गुरु तो अपना दोस्त ही है...अच्छा सन्नी, ये बता वो दिव्या वाले मैटर का क्या हुआ तूने उसकी दोस्ती कराई की नहीं उस नकचढ़े इमरान से.” ,उन दोस्तों में से ही एक ने  सन्नी से किसी पुराने केस के बारे में पूछा जो सन्नी के पास दो महीने पहले आया था.
“अबे उसे तो मैंने ही पटा लिया, क्योंकि इमरान से दोस्ती कराते-कराते मुझको दिव्या अच्छी लगने लगी. ये देख उसका नंबर है मेरे फ़ोन में.” ,सन्नी अपना फ़ोन निकालकर सबको दिखाते हुए बोला.
फिर सारे दोस्त आपस में हंसी-मज़ाक में व्यस्त हो गए लेकिन सन्नी के कहे गए वो कुछ अलफ़ाज़ रोहित के कानों में उसके घर जाने तक गूंजते रहे. वह जब रात को सोया तो उसे ना जाने क्यों ऐसा लगने लगा कि आज उसका मिज़ाज कुछ भारी सा है और उसके मन में कुछ बोझ पड़ा है जिसे वह चाहता है कि हल्का करे. रोहित देर रात तक करवटें बदलता रहा और अपने मन में यह गुणा-भाग करता रहा कि क्या सच में उसके दिल में भी ऐसे खयालात आते हैं जिन्हें उसने कई बार कोशिश की कि वह अपने माँ-पिता जी को बताये मगर उनके प्रति डर और सम्मान के चलते नहीं बता पाया. सही में, उसने तो कई बार अपनी बातें अपने चचेरे भाइयों को बतानी चाही, अपने चाचा को बतानी चाही लेकिन वह बता नहीं पाया. वैसे एक बार बताया तो था उसने दुसरे के खेत से दोस्तों के साथ मज़े-मज़े में गाजर चुराकर खाने की बात लेकिन क्या हुआ, बड़ी दीदी ने पिता जी को बता दिया और जम कर मार पड़ी थी. ऐसे कई बार उसने अपने दिल की बातें बतायीं और उसके चचेरे भाइयों ने उसे पुरे गाँव में फैला कर ख़ूब मज़े लिए. ऐसे ही उसे एक बार बगल के गाँव की एक लड़की बहुत अच्छी लगने लगी तो उसने राहुल से बताया और उसने इस बात का ढिंढोरा पीट दिया था और उसकी ख़ूब फज़ीहत हुई थी. इसलिए रोहित ने निश्चय कर लिया था कि अपने दिल की बात किसी को नहीं बताएगा. धीरे-धीरे वह और कामों में इतना मशगूल हो गया कि अपने एहसासों की उसे कभी फ़िक्र ही ना हुई लेकिन सन्नी के उन बातों ने उसे फिर से यह सोचने को विवश कर दिया था कि क्या मुझे भी अपनी बातें बताने के लिए किसी की ज़रूरत है. रोहित इस बात को लेकर कुछ गंभीर हो गया था.
                         रोज़ की तरह वही दिनचर्या चलने लगी. वही पढाई और दोस्तों के साथ मस्ती लेकिन एक दिन किसी बात को लेकर रोहित बड़ा उदास था शायद उसे सर ने प्रोजेक्ट तैयार नहीं होने के कारण डांट दिया था. अपने कमरे में बैठा रोहित ऐसा महसूस कर रहा था कि जैसे अभी उसे रोना आ जायेगा. उसने फ़ोन निकाला और सन्नी को कॉल लगा दिया.
“हेल्लो सन्नी! यार तू सही कह रहा था, मुझे किसी की ज़रूरत है जिसे मैं अपनी फीलिंग्स बता सकूँ, तूने कहा था कि मुझे कभी ऐसा लगे तो मै तुझे कांटेक्ट करूँ तू मेरी मदद करेगा. अब यार...”
“हा...हा...मैं समझ गया कि तुझे अब ऐसा लगता है कि तुझे किसी की ज़रूरत है मतलब किसी दोस्त की, चल मैं तेरा दोस्त हूँ, तू मुझे ही बता दे.” ,सन्नी हँसता हुआ बोला.
“यार मज़ाक मत कर, मेरी हेल्प कर प्लीज़” ,रोहित विनती करता हुआ बोला.
“अच्छा मेरे भाई, ठीक है कल आ मैं तुझे नंबर दूंगा और समझा दूंगा कि कैसे बात करनी है. ओके? मेरी बेस्ट फ्रेंड की एक सहेली है, हमसे सीनियर है और ग्रेजुएशन पास है लेकिन मेरी दोस्त बताती है कि वह बहुत अच्छी है. मैं उससे तेरा जुगाड़ बिठाता हूँ, देख वह आसानी से मानती है कि नहीं.”
“चल ठीक है, जैसा होगा वैसा देख ले, बाय. कल मिलते हैं.” ,रोहित थोड़ा सा ख़ुश होता हुआ बोला. अब जाकर उसने राहत की सांस ली.
     अगले दिन रोहित ख़ुशी-ख़ुशी कॉलेज गया और सबसे पहले सन्नी से मिला. सन्नी ने उसे उस लड़की का नंबर दिया और साथ ही उसने रोहित को यह भी बताया कि उसने अपनी दोस्त से भी बात कर ली है और उस लड़की से बात कर ली है उसने कहा है कि वह रोहित से बात करने को तैयार है लेकिन पहले वह उसे परखेगी कि वह दोस्त बनाने के लायक है या नहीं.
“तो तुम्हें क्या लगता है, मैं उसके दोस्ती के काबिल हूँ कि नहीं?” ,रोहित ने बड़ी उत्सुकता से पूछा.
“तू एकदम अच्छा है यार, टेंशन क्यों लेता है बस थोड़े अच्छे से बात करना और दोस्ती तक ही बात सीमित रखना और अभी फ़ोन मत मिलाना, शाम को मिलाना वह अपने कॉलेज में होगी.” ,सन्नी उसे समझाता हुआ बोला.
“हाँ यार मुझे तो बस दोस्ती ही करनी है और कुछ नहीं. ओके थैंक यू वैरी मच.” ,रोहित सन्नी के धन्यवाद देता हुआ बोला.
       शाम को सात बजे अपने इष्ट देव को याद करके रोहित ने फ़ोन मिलाया. फ़ोन मिलाने से पहले वह बेचैनी में तीन बार टॉयलेट जा चुका था. कॉल पहली बार में ही लग गया.
“हेल्लो, कौन?” ,उधर से एक प्यारी सी आवाज़ आई.
“हेल्लो, कौन बोल रहा है?” ,फिर वह आवाज़ फ़ोन के स्पीकर से आती हुई रोहित के कानों के पर्दों को छू गई.
रोहित ने काफ़ी हिम्मत की लेकिन वह कुछ बोल नहीं सका और उसने फ़ोन काट दिया. वह प्यारी सी आवाज़ वैसे ही उसके कानों में गूंज रही थी. यह रोहित के जीवन में पहला मौक़ा था जब वह किसी लड़की से दोस्ती करने जा रहा था हालांकि अभी तक वह उससे बोलने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाया था. वह अभी सोच रहा था कि कैसे बात की शुरुआत करे तब तक उस नंबर से कॉल आने लगा.
अब रोहित ने भगवान को याद किया और फ़ोन रिसीव कर लिया.
“हेल्लो, आप कविता जी बोल रही हैं पटना से? मैं रोहित बोल रहा हूँ गोरखपुर से, आपका नंबर मुझे सन्नी ने दिया है अपने दोस्त सुप्रिया से लेकर. आप सुप्रिया की सहेली है ना?” ,रोहित ने हड़बड़ी में उसका परिचय पूछते हुए अपना पूरा परिचय भी बता दिया.
“जी हाँ, तो तुम ही रोहित हैं. वैसे आपने बिना पूछे पूरा इतिहास सुना दिया, क्यों, तुम्हें मेरे से बात करने में डर लग रहा है क्या?” ,कविता बड़े सामान्य से स्वर में बोली. उसकी बातों से नहीं लगा कि वह किसी अजनबी से बात कर रही है और ऐसा इसलिए नहीं लगा क्योंकि वह रोहित से सीनियर भी थी और शहर में रहने वाली एक बोल्ड लड़की भी.
“जी नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, वो...मैंने कभी किसी अनजान लड़की से बात नहीं की है ना फ़ोन पर, इसलिए.”
“अच्छा इसका मतलब, फ़ोन पर नहीं की है तो सामने तो की होगी ना, तो फिर क्यों नर्वस हो?”
“क्या पता?”
“अच्छा, यह बताओ अभी कौन सी पढाई कर रहे हो? शायद तुम बीएससी में हो ना? आगे क्या करने का ख्याल है?”
“आगे, सरकारी नौकरी के लिए अप्लाई करूँगा, एसएससी या पीसीएस की परीक्षा दूंगा.”
“गुड, और बताओ तुम्हें क्या-क्या पसंद है?”
“पढना, क्रिकेट खेलना और घूमना-फिरना.”
“फ़िल्में देखते हो, किस टाइप की फ़िल्में देखना पसंद है?”
“एक्शन वाली फ़िल्में ज्यादा देखता हूँ.”
“और लव स्टोरीज?”
“हाँ, अच्छी लगती हैं, मुझे दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे सबसे ज्यादा पसंद है.”
“अच्छा, यह बताओ किसी से प्यार करते हो?”
“नहीं, किसी से नहीं करता?” ,रोहित बहुत तेज़ी से जवाब देता हुआ बोला.
“क्यों, कोई मिला ही नहीं या किसी ने भाव ही नहीं दिया?”
“नहीं, मुझे कोई पसंद ही नहीं आया.”
“अच्छा ये बताओ, तुमने इंटरव्यू देने के लिए फ़ोन किया है?” ,कविता ने रुख बदलते हुए पूछा.
“नहीं तो, क्यों? क्या हुआ??”
“क्योंकि मैं सवाल पर सवाल पूछे जा रही हूँ और तुम चुपचाप जवाब दिए जा रहे हो. तुम्हारे पास कुछ है भी कि नहीं पूछने को?” ,कविता शिकायती लहज़े में बोली.
“ओह सॉरी, आई एम् वैरी सॉरी.” ,रोहित झेंप सा गया.
“तो पूछो, मेरे बारे में भी कुछ पूछना है या ख़ुद के बारे में ही बताते रहोगे.”
अब रोहित कविता से थोड़ा सा खुला था. हालांकि वह अपनी बेवकूफी पर मन ही मन शर्म से लाल हुआ जा रहा था. रोहित ने भी कुछ बातें पूछीं और फिर आगे फ़ोन करने का वायदा कर फ़ोन रख दिया. दस मिनट तक चली इस बातचीत में रोहित ने अपने बारे में काफ़ी कुछ बता दिया था लेकिन वह कविता के बारे में केवल इतना ही जान पाया था कि वह अभी एम.ए. के पहले साल में है और टीचर बनना चाहती है. वह पटना के वीमेंस कॉलेज में पढ़ती है और उसकी तीन सहेलियां हैं और कोई लड़का दोस्त नहीं है. रोहित अभी ज़िन्दगी के इस फील्ड में कच्चा था लेकिन इतना तो जानता था कि जिस लड़की का कोई लड़का दोस्त ना हो तो उस लड़की का दोस्त बनने में भलाई होती है और यह सूत्र लड़कियों के लिए भी बराबर ही कारगर है. उसे पहली बातचीत में ही कविता के रूप में एक अच्छी दोस्त दिखने लगी थी.
      कविता से बात करने के बाद रोहित अचानक उछल पड़ा था, उसे ऐसा लगा कि आज उसका वजन कुछ कम हो गया है क्योंकि वह इस तरह पहले कभी नहीं उछला था. बहरहाल रोहित को घबराने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि उसका वजन उसके मन में लदी भावनाओं के चलते अधिक था और अब कविता से मिल लेने के बाद वह कुछ कम हो गया था. अगले दिन वह कॉलेज में सबसे पहले सन्नी से मिला और कविता से बात कराने के लिए शुक्रिया अदा किया. आज से रोहित के लिए खुशनुमा दिन की शुरुआत थी. उसके बाद रोहित को कभी किसी ने उदास नहीं देखा, हमेशा ख़ुद में मुस्कुराते देखा. कभी-कभी वह उदास होता था लेकिन तब; जब उसकी कविता से बात नहीं होती थी या किसी बात को लेकर झगडा हो जाता. एक-दुसरे से बातें शुरू करने के कुछ दिन बाद ही उनकी दोस्ती हो गयी थी, अब यह दोस्ती धीरे-धीरे आदत बनने लगी थी. यह आदत भी कुछ महीनों बाद अपने अगले पड़ाव यानि ज़रूरत बन गयी. और फिर वो दिन भी दूर नहीं रहा जब इनकी दोस्ती को एक नया नाम मिल गया और वह ज़रूरत अब दोनों की ज़िन्दगी बन गयी थी.
                    नए साल के दुसरे महीने यानि फरवरी में दूसरे सप्ताह का कोई दिन था. यह मौसम से भी खुशगवार महिना है और इसमें दो ह्रदय के मिलन का भी शुभ मुहूर्त होता है. अमूमन फरवरी बसंत की सुन्दर ऋतु होने के साथ ही वैलेंटाइन के पर्व के लिए भी महत्वपूर्ण होता है और रोहित भी अब इन शहरी क्रियाकलापों में भी कच्चा नहीं था सो उसका मन भी किसी अनजानी चीज़ के लिए बेचैन था परन्तु इस बात को लेकर भ्रम में था कि क्या कविता में भी ऐसी कुछ ऐसी ही बेचैनी है?
“दो दिन हो गए, कविता का नंबर नहीं लग रहा है और उसने भी फ़ोन नहीं किया है. क्या बात है? कही कोई दिक्कत तो नहीं हो गयी है न उसके साथ??” ,रोहित ख़ुद से पूछता हुआ बोला.
“नहीं यार, शायद उसके घर मेहमान आ गए होंगे इसलिए वह व्यस्त होगी...लेकिन क्या इतना व्यस्त हो गयी कि मुझे फ़ोन करने की भी फुरसत नहीं मिली उसे? वैसे तो बड़ी मेरी चिंता करने वाली बनती है लेकिन दो दिन हो गए और अब तक फ़ोन नहीं किया.”
रोहित पढने बैठा था लेकिन उसका ध्यान कविता के फ़ोन ना करने के कारणों में फंसा था. कुछ देर मन लगाने की कोशिश करता लेकिन फिर घूम-फिर कर वहीं आ जाता.
“कहीं ऐसा तो नहीं, वैलेंटाइन का टाइम चल रहा है और वो किसी और के साथ...धत्त तेरी की, मैं पागल हूँ यार, ना जाने क्या-क्या सोचता हूँ?...लेकिन सन्नी बता रहा था कि उसकी दोस्त कह रही थी कि कविता बड़ी खुबसूरत है. अगर वह खुबसूरत है तो फिर तो उसके कई सारे दोस्त हो सकते हैं.” ,रोहित के दिमाग़ में कई सारी बातें चल रहीं थीं. लेकिन वह बार-बार कोशिश कर रहा था अपना ख्याल उधर से हटाये लेकिन मन को कौन रोक सकता है, उसपर विजय पाने वाला तो फिर मनस्वी हो जाता है और कलयुग में मनस्वी होना तो बड़ा कठिन है. अंत में हारकर रोहित ने अपनी क़िताब बंद की और सोने चला गया. उसने खाना नहीं खाया था और खाने का मन भी नहीं था.
                                           अगले दिन सुबह सात बजे उसकी नींद फ़ोन का रिंगटोन बजने के कारण खुली, देखा कविता का फ़ोन था; तीसरे दिन आया था. रोहित ने लपक कर फ़ोन उठा लिया लेकिन बनावटी गुस्से में बोला, “याद आ गयी हमारी? हमें लगा कि आप तो हमें भूल ही गयीं हैं.
“वो सब बातें बाद में, पहले मुझे तुम्हें एक बात बतानी है, एक काम करो. जल्दी से जाकर नहाओ और आस-पास राधा-कृष्ण का कोई मंदिर हो तो वहां जल्दी पहुँच जाओ आधे घंटे में, मैं तुम्हें आधे घंटे बाद फ़ोन करती हूँ.”
“हाँ मंदिर तो है लेकिन बात क्या है यह तो पहले बताइये.”
“वही तो बता रही हूँ, सवाल मत पूछो, जल्दी से नहा-धोकर पहुँचो आधे घंटे में, इतने देर में मैं भी तैयार हो लेती हूँ.” ,इतना कहकर कविता ने फ़ोन काट दिया.
रोहित सोच में पड़ गया कि यह कविता को क्या हो गया है जो मेरे को नहाकर मंदिर जाने को बोल कर ख़ुद भी तैयार होने चली गयी, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह भी गोरखपुर आ गयी है मुझे सरप्राइज करने के लिए. क्योंकि उसके नानी का घर यहीं शहर के बगल में ही तो है. परन्तु रोहित ने आगे कुछ सोचने और जांच-पड़ताल करने से तैयार होना बेहतर समझा और वह जल्दी से नहाने-धोने चला गया.
                ठीक आधे घंटे बाद वह जल्दी-जल्दी मोहल्ले के सामने राधा कृष्ण के मंदिर में पहुँच गया. अभी वह फ़ोन करने वाला था कि उधर से कविता का फ़ोन आ गया.
“पहुँच गए मंदिर?”
“हाँ, बताइए क्या करना है और मंदिर क्यों बुलवाया आपने?”
“पहले जाओ और प्रसाद लेकर मंदिर में चढ़ाओ और मत्था टेको, फिर बताती हूँ.” ,फ़ोन कट गया.
रोहित ने किसी आज्ञाकारी बालक की तरह कविता के आज्ञा का पालन किया और मंदिर में पूजा कर लिया. इस बार रोहित ने फ़ोन किया पर उसका कोई जवाब न मिला. कुछ देर बाद फिर मिलाया तो इसबार कविता ने फ़ोन उठाया.
“हेल्लो, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि आप ये क्या करवा रहीं हैं मुझसे? और कुछ बता भी नहीं रहीं हैं.”
“अभी तक नहीं समझे बुद्धू?”
“नहीं, और क्या नहीं समझा?”
“आज वैलेंटाइन्स डे है?”
“तो क्या हुआ?”
“तुम्हें मुझसे कुछ कहना नहीं है?” ,कविता ने गंभीर होते हुए पूछा.
“क्या? नहीं कुछ भी तो नहीं कहना है.” ,रोहित ने जवाब दिया.
“मतलब आज के दिन तुम्हें कुछ कहना नहीं है, तुम्हारे मन में कोई बात नहीं है?”
“मन में तो बातें बहुत हैं, सबसे पहले सवाल है कि आपने दो दिन से फ़ोन क्यों बंद कर रखा था? और आज मेरी याद आई? वाह! आप तो मेरी बहुत चिंता करती हैं!!
“अच्छा, तो बस यही सवाल हैं मुझसे पूछने के लिए, तुम कितने बेवकूफ हो यार.” ,इतना कहकर कविता ने फ़ोन काट दिया.
रोहित को अजीब लगा लेकिन ख़ुद पर गुस्सा भी आया कि उसे कविता से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी. उसने फिर फ़ोन लगाया.
“हेल्लो, सॉरी कविता जी, मुझे माफ़ कर दीजिये, मुझे आपसे सवाल नहीं पूछना चाहिए था.”
“इट्स ओके...रियली तुम मेरे बारे में कुछ नहीं सोचते?”
“क्यों नहीं, मैं आपके बारे में बहुत कुछ सोचता हूँ. सोचता हूँ आप इतनी अच्छी बातें करती हैं तो देखने में कितनी खुबसूरत होंगी. मैं चाहता हूँ कि पूरी ज़िन्दगी आपसे ही बात करता रहूँ...”
“और कुछ...और कुछ नहीं सोचते?”
“और भी ज़्यादा सोचता हूँ. सोचता हूँ कि पूछूँ...”
“क्या पूछूँ? फिर, पूछो ना.”
“यही कि आप मुझसे हमेशा ऐसे ही बात करेंगी ना?”
“बस यही पूछना चाहते हो...ओफ्फोह यार...मुझे ही बोलना पड़ेगा मतलब?” ,कविता ठंडी आह भरते हुए बोली.
“क्या बोलना पड़ेगा?” ,रोहित अपने उसी अंदाज़ में बोला.
“यही कि तुम बुद्धू हो और थोड़े से उल्लू भी. डफर! आज वैलेंटाइन्स डे है, लड़की ने तुम्हें सुबह उठकर मंदिर जाने को बोला और वो भी राधा-कृष्ण के मंदिर, तुमसे तबसे कुछ बोलने को कह रही है और पता नहीं तुम कौन से कौन से ग्रन्थ का वर्णन कर रहे हो जबकि तुम्हें प्रेम-ग्रन्थ का पाठ करना चाहिए.”
“अच्छा, तो यह बात है, मैं समझ नहीं पाया न, इसलिए. कोई बात नहीं चलिए आज वैलेंटाइन मनाएंगे, हैप्पी वैलेंटाइन्स डे!”
“ओह माय गॉड! भगवान् बचाए तुम्हें!! तुम पूछ रहे थे न कि मैंने फ़ोन क्यों किया और परेशान क्यों किया तुम्हें? मैंने यह कहने के लिए फ़ोन किया है कि ‘आई लव यू’, मैं तुम्हें प्यार करती हूँ, तुम करते हो कि नहीं जल्दी बताओ.” ,अंत में हारकर कविता ने ही रोहित को अपने प्यार का इज़हार कर दिया.
“क्या सच में? मैं भी आपसे प्यार करता हूँ लेकिन आप सच में मुझे प्यार करती हैं ना?” ,रोहित लगभग चौंकता हुआ बोला.
“रियली! और जब तुम करते हो तो पहले बोला क्यों नहीं, मैं पागल हूँ जो तब से भोंके जा रही थी मैं यही तो सुनना चाहती थी तुमसे लेकिन तुम पुरे मिटटी के माधो निकले. और सुनो मुझे ये आप-वाप मत बोला करो. तुम बोलो, अच्छा लगता है!”
“लेकिन आपको आप बोलना मुझे अच्छा लगता है.”
“लेकिन अब तुम कभी नहीं बोलोगे, समझे? ऐसा लगता है जैसे मैं कोई मैम साहब हूँ.”
“ठीक है आप को तुम बोलूँगा...मतलब तुमको तुम बोलूँगा, चलो मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ पहले सन्नी को यह खुशखबरी देनी है. आपको एक घंटे बाद फ़ोन करता हूँ.” ,रोहित फ़ोन काटने के बाद पागलों की तरह मुस्कुराते हुए कूद रहा था. आज उसका दिल और दिमाग़ दोनों सातवें आसमान पर थे. उसने रोहित को खुशखबरी दी फिर एक दो दोस्तों को और बताया और फिर पुरे दिन कविता से बात करने में बिता दिए. शाम को वह मंदिर गया और वहां उसने अपने ज़ेब ख़र्च के लिए आये रुपयों में से कुछ रूपये ग़रीब बच्चों में बाँट दिए और कुछ से आस-पड़ोस के लोगों के लिए मिठाई ख़रीद लाया. और उन्हें यह कहकर मिठाई खिलाई कि उसका एक प्रतियोगिता परीक्षा में अच्छा नम्बर आया है. पर ख़ुशी तो कुछ और ही थी और वह रोहित का दिल बखूबी महसूस कर रहा था.
                           रोहित और कविता की प्रेमकहानी चल निकली थी. वैलेंटाइन गिफ्ट के रूप में दोनों ने एक दुसरे की तस्वीर डाक से भेजी थी. दोनों ने एक-दुसरे को फोटो में भी पसंद कर लिया. कहते हैं कि अगर गाड़ी एक बार चलनी शुरू कर दे तो रफ़्तार तो पकड़ती ही जाती है. ऐसा ही हुआ, अब रोहित की कविता और कविता का रोहित हो गया था. रोहित की जब सेकंड इयर की परीक्षा ख़त्म हुई तो यह निश्चय हुआ कि रोहित कविता से मिलने उसके शहर पटना जायेगा और इसमें मदद करेगा रोहित का सबसे अज़ीज दोस्त सन्नी जो ख़ुद अपनी पुरानी क्लासमेट दोस्त सुप्रिया से मिलने जायेगा. दोनों ने एक खुबसूरत बहाना बनाया कि वे अपने इंजीनियर दोस्त से मिलने और पटना के एक कॉलेज में विज्ञान के सेमिनार में भाग लेने साथ जा रहे हैं. इसे उन्होंने अपने घर वालों को सुनाया और घर वाले ख़ुशी-ख़ुशी राज़ी हो गए, खैर छुट्टियाँ भी थीं. ख़र्च के लिए रूपये जो कुछ रोहित ने ज़ेब ख़र्च से बचाए थे और कुछ घर से मंगाकर पटना के लिए सन्नी के साथ चल निकला. दोनों तरफ ख़ुशी का माहौल था क्योंकि वे-एक दुसरे को पहली बार देखने और मिलने जा रहे थे.
                     उत्साहित रोहित सन्नी के साथ स्टेशन पर बहुत पहले ही पहुँच गया. वहां से उन्होंने हाजीपुर के लिए ट्रेन पकड़ी. ट्रेन रात को थी और अगले दिन सुबह हाजीपुर पहुँची. वहां से वह पटना के लिए निकले और सुबह आठ बजे तक एक लॉज में कमरा बुक कर के निश्चिन्त हो गए थे. जब आदमी किसी चीज़ की चाहत में होता है तो उसके पास पहुँचने के रास्ते में आने वाला हर काम और इंतज़ाम बहुत जल्दी-जल्दी करता जाता है. फ़ोन पर निश्चय हुआ कि वे गांधी मैदान के पास में मिलेंगे. फिर फ्रेश होना, नहाना-धोना और फिर सज-संवर के तैयार होना; सब काम एक घंटे के दरमयान पूरे हो गए जो कॉलेज जाने के समय दो-ढाई घंटे लगाते हैं. यह बेताबी नहीं तो और क्या थी कि रोहित ने बस की जगह ऑटो रिज़र्व करके जाने पर आमादा था लेकिन सन्नी के कहने पर वह बस से गए. हालांकि इनके पहुँचने से पहले वह दोनों पहुँच चुकीं थीं जिसकी जानकारी इन्हें मेसेज के रूप में मिल गई. बस की थोड़ी भी धीरे रफ़्तार रोहित को अन्दर तक खौला देती थी. वह मन ही मन लेट होने पर ख़ुद को और सन्नी को कोस रहा था और बस-ड्राईवर को भी भला-बुरा कह रहा था.
                                           इंतज़ार की घड़ियाँ ख़त्म हुईं और वह दोनों गाँधी मैदान पहुँच चुके थे. उन्होंने फ़ोन कर उनके बैठने की जगह पूछी. सुप्रिया उन्हें पार्क के गेट के पास उन्हें लेने पहुँची. सन्नी सुप्रिया से मिल चुका था सो उसे तुरंत पहचान गया और रोहित ने भी कविता का फोटो देखा था इसलिए उसे भी पहचानने में दिक्कत नहीं हुई. कविता एक पेड़ के पास बेंच पर बैठी हुई थी. उसने दोनों से हाथ मिलाते हुए उनका हाल-चाल पूछा. रोहित और सन्नी सामने की बेंच पर बैठ गए. और फिर इनकी बात-चीत शुरू हो गयी. रोहित का ध्यान बात-चीत में कम और कविता को देखने में कुछ ज्यादा ही था क्योंकि वह बातों में केवल हूं-हाँ ही कर रहा था. एक बात उसे कुछ अटपटी सी लग रही थी जो उसके मन में अजीब सा शक भी पैदा कर रही थी लेकिन उसे वह पूछने की हिम्मत भी न होती थी. कुछ देर बाद सुप्रिया अचानक विषय बदलती हुई बोली, “यार, हम भूखे पेट ही यहाँ बकवास करते रहेंगे, कुछ खायेंगे-पीयेंगे नहीं?”
“बोलो, क्या खाया जाये? तू कुछ बोल भाई रोहित, तू तो एक दम शांत ही हो गया है.” ,सन्नी रोहित को हिलाता हुआ बोला.
“शांत नहीं हो गया, यह तो कविता दी को देख रहा है. अब हमारी दीदी हैं ही इतनी खुबसूरत कि कोई भी देखे तो देखता ही रहा जाये. हाय! नज़र ना लगे मेरी दी को.” ,सुप्रिया भी रोहित को छेड़ती हुई बोली.
रोहित और कविता दोनों एक पल को झेंप गए. लेकिन कविता का दुधिया चेहरा शायद शर्म के चलते हल्का लाल भी हो गया.
“कुछ भी ले आओ लेकिन कोल्ड-ड्रिंक ज़रूर लाना और उसमें भी कोक...” ,कविता ख़ुद को संभालती हुई बोली.
“क्योंकि रोहित को यही पसंद है, है ना!” ,सन्नी हँसता हुआ बोला.
“चुप-चाप जा, बकवास बंद कर बेवकूफ कहीं का.” ,रोहित चुप्पी तोड़ता हुआ बोला.
“चलो, मैं भी चलती हूँ.” ,सुप्रिया उठती हुई बोली. और वो दोनों खाने के लिए कुछ लाने जैसे ही आगे बढे थे कि कविता ने सुप्रिया को आवाज़ लगाई और ख़ुद उसके पास जाकर उसके कान में कुछ फुसफुसाकर फिर आकर बेंच पर बैठ गयी.
        अब रोहित का शक यक़ीन में बदल गया था. कविता विकलांग थी, उसकी एक टांग शायद पोलियो का शिकार होने के चलते बेजान थी और उसे अपनी दूसरी टांग के घुटनों पर हाथ का ज़ोर देकर चलना पड़ता था. रोहित कविता को देखने के कुछ देर बाद से यही ग़ौर कर रहा था कि कविता ऐसे क्यों बैठी है जैसे कि उसका एक पाँव ज़मीन पर अच्छी तरह से है और दूसरा पाँव हल्का सा ज़मीन को छू रहा है. कुछ देर के लिए रोहित को मानो सांप सूंघ गया था. एकदम बुत सा रोहित अपने दिमाग़ में जाने क्या नाप-तोल कर रहा था जिसमें केवल उसका मस्तिष्क उसके साथ था और हाथ-पैर सुन्न थे.
फ़ोन पर बिना शर्म और फ़र्राटे से बोलने वाली कविता थोडा सकुचाते हुए रोहित से बोली, “कैसी लग रही हूँ? फोटो की तो बड़ी तारीफ़ की थी अब सामने हूँ तो एक शब्द भी नहीं कहने को?”
“अच्छी लग रही हो.” ,रोहित ने अनमना सा जवाब दिया.
“बस अच्छी लग रही हूँ, क्या हुआ आज तुम्हारा मूड ठीक नहीं है क्या? तुम फ़ोन पर तो मुझसे मिलने को काफ़ी बेचैन थे, अब क्या हुआ? शर्म आ रही है.” ,कविता शिकायती लहज़े में बोली.
“नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, बस ऐसे ही...” ,रोहित के आँखों में इस बात की बेरुखी साफ़ दिख रही थी कि कविता ने उसे आज तक नहीं बताया था कि वह पैर से विकलांग है. उसने क्या-क्या सपने बुने थे अपने और कविता के लिए. उसने तो प्यार करने के तुरंत बाद शादी के बारे में भी सोच लिया था यहाँ तक कि वह मनाली हनीमून मनाने जाना चाहता था और बच्चों के नाम भी सोच लिए थे लेकिन यह क्या? अब तो उसका सपना, सपना ही बन कर रह जायेगा. वह जिसे अपने ख्वाबों की शहज़ादी समझकर इश्क़ कर बैठा था, उसे वह कैसे सबके सामने अपनी बीवी बता सकेगा. कविता उसका क्या साथ निभाएगी जब उसे ख़ुद हर समय दुसरे के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है. सब लोग तो उसे पागल ही कहेंगे न कि एक तो उसने नियम के खिलाफ़ प्रेम-विवाह किया और ऊपर से एक विकलांग लड़की से. सब लोग उसकी मुर्खता पर हसेंगे. लेकिन वह फँस चुका था क्योंकि उसने कई वायदे किये थे कविता से. मगर वायदे किये थे उसने तो, उस कविता से किये थे जो बहुत खुबसूरत लड़की थी, यह तो खुबसूरत है लेकिन एक खोट के साथ. मैंने इससे कोई वायदा नहीं किया है, इसे तो मैं जानता ही नहीं. रोहित के दिमाग़ की मशीन काफ़ी तेज़ विचार पैदा कर रही थी और वह सब कविता के खिलाफ़ ही थे लेकिन राहत की बात यह थी कि उसका दिल अभी भी इन विचारों की ख़िलाफ़त कर रहा था.
“ओफ्फोह, यार तुमने तो हद कर दी, क्या बात है, बताओगे? एक तो तुम कुछ बोलते नहीं और कहते हो कि मूड भी बढ़िया हैं? तुम्हें मेरी क़सम कि जो बात है वह तुम बताओगे.” ,अंत में परेशान होकर कविता बोली.
“नहीं कुछ ख़ास नहीं लेकिन यह तुम्हारे पैर में...?” ,रोहित ने अपना वाक्य अधुरा ही छोड़ दिया.
“ओह! आई’म सॉरी! मुझे माफ़ करना कि मैंने तुम्हें आज तक नहीं बताया. तुम इसके लिए ही परेशान हो?” ,कविता हडबडाते हुए बोली उसका गला इसबार कुछ भर्राया हुआ था. शायद उसे अपनी ग़लती का एहसास हो रहा था और साथ ही साथ डर भी था रोहित की आने वाली प्रतिक्रिया का.
“तुमने इतनी बड़ी बात बतायी क्यों नहीं?” ,आवाज़ ऊँची थी रोहित की.
“आई’म रियली सॉरी! रोहित मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी है कि तुम्हें बताया नहीं कि मेरे साथ यह दिक्कत है. दरअसल मैं शुरू में ही तुम्हें बताना चाहती थी लेकिन मुझे मौक़ा नहीं मिला फिर धीरे-धीरे तुम मुझे अच्छे लगने लगे और तुम भी मुझे बहुत ज्यादा पसंद करने लगे. मैं नहीं चाहती थी कि तुम्हें बताऊँ और तुम नाराज़ हो जाओ...रोहित! आई लव यू वेरी मच और मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी इसलिए तुम्हें बताने की हिम्मत नहीं कर पाई कि मेरे साथ यह दिक्कत है. सॉरी रोहित...आई एम वैरी सॉरी, रियली सॉरी.” ,इतना कहते ही कविता सुबकने लगी. उसकी खुबसूरत आँखों से आंसू चेहरे पर एक लकीर में बहते हुए नीचे कोर तक आ गए. उसके आँखों में लगी काजल की पतली लाइन इन आंसुओं से धुल कर हलकी हो गयी थी.
“लेकिन तुमने झूठ क्यों बोला? तुम्हें मुझे सच बता देना चाहिए था. तुम झूठी हो और धोखेबाज हो. मैं तुमसे प्यार नहीं करता.” ,रोहित अपने रुख पर कायम रहा.
“रोहित, प्लीज ऐसा मत कहो, प्लीज भगवान के लिए मान जाओ. मुझे माफ़ कर दो.” ,कविता रोती जा रही थी.
“सन्नी आएगा तो कह देना कि मुझे कॉल कर लेगा और तुम मेरा नंबर डिलीट कर देना और मुझे कभी कॉल मत करना और साथ ही भूल जाना कि तुमने किसी रोहित से बात भी की थी.” ,रोहित वहाँ से गुस्से में तेज़ी से चला गया लेकिन कुछ दूर आने के बाद उसे ऐसा लगा कि जैसे उसके पाँव भारी हो गए हैं और आगे कि तरफ बढ़ ही नहीं रहे हैं लेकिन वह रुआंसे मन से ऑटो में बैठा और अपने लॉज के तरफ लौट गया. रास्ते में उसका मन अपनी क़िस्मत पर रोने को कर रहा था लेकिन वह ख़ुद को रोकता रहा लेकिन जैसे ही वह लॉज के कमरे में पहुंचा उसके सब्र का बांध टूट गया और वह फूट-फूट कर रोने लगा. उसे कभी ख़ुद पर, कभी कविता पर बहुत ज़ोर का गुस्सा आ रहा था. क़रीब आधे घंटे तक रोने के बाद उसने देखा तो सन्नी के कई मिस्ड कॉल थे. उसने सन्नी को फ़ोन किया और उसे शाम तक आने को बोल दिया क्योंकि अब वह पटना एक मिनट भी नहीं रुकना चाहता था क्योंकि उसे पटना शहर से नफरत होने लगी थी. शाम को सन्नी ने उसे बहुत मनाने की कोशिश की लेकिन वह अपनी ज़िद पर अड़ा रहा. फिर वह दोनों रात की ट्रेन से गोरखपुर को लौट आये.

तीन महीने बाद

रोहित अपनी पुरानी ज़िन्दगी में फिर एक बार लौटने की कोशिश कर रहा था लेकिन हर जगह उसे एक कमी खलती, वह थी कविता की कमी. वह बिस्तर जिस पर वह लेटकर कविता से रात-रात भर बातें करता, वह प्रेशर कुकर जिसमें कविता ने फ़ोन पर उसे कुकर पनीर और मैगी बनाना सिखाया था. वह  दीवाल की झड़ती पपड़िया छिपाने के लिए लगाये गए अख़बार पर लिखा कोड भाषा में कविता और अपना नाम, सब चीज़ उसे कविता की याद दिलाते थे. रोहित का दिल चाहता कि वह कविता को अपना ले लेकिन उसका दिमाग़ कहता कि ख़ुद इतना अच्छा-भला है कहाँ एक ऐसी लड़की के पीछे पड़ा है जो शरीर से निसहाय है. कविता ने कई बार रोहित को कांटेक्ट करने की कोशिश की लेकिन रोहित हर बार उससे बात करने से कतराता रहा.
                    कॉलेज खुल चुका था और रोहित अगले साल यानि थर्ड इयर में आ चुका था. जब सभी दोस्त मिले तो सबने रोहित से कविता छोड़ने का कारण पूछा. रोहित ऐसे सवालों से बचता रहा लेकिन एक दिन उसकी क्लास उसके दोस्तों ने लगा ही दी. उसे सन्नी से मालूम चला कि वह जिस कविता को कमज़ोर और निसहाय समझता था, वह कविता घर पर एक बड़ी सी कोचिंग क्लास चलाती है और महीने के पचास-साथ हज़ार रूपये उसकी आमदनी हो जाती है वह किसी पर निर्भर नहीं बल्कि वह ख़ुद अपनी मम्मी और छोटे भाई-बहन का ख़र्चा चलाती है उसके पापा प्राइवेट नौकरी में थे, एक एक्सीडेंट में मारे गए तबसे यही सब कुछ देखती है. कविता का पहला प्यार रोहित ही है क्योंकि वह पहले प्यार में विश्वास नहीं करती थी इसलिए उसने लड़कों से दोस्ती करने के बारे में कभी नहीं सोचा था. और, उसे जब इसके भोलेपन के कारण इससे प्यार हो गया तो वह उसे कभी खोना नहीं चाहती थी इसलिए वह इसे कभी सच्चाई बताने की हिम्मत न कर पाई.
सन्नी- तुझे मालूम है तेरे बार-बार कहने के चलते मैंने सुप्रिया से कहा था वह कविता को मनाये कि वह तुझसे बात करे क्योंकि कविता किसी लड़के से बात करना नहीं चाहती थी लेकिन जब उसे पता चला कि तू अच्छा लड़का है तो वह तेरे से बात करने को तैयार हुई. और तूने ये किया उसके साथ? वाह भाई! क्या प्यार करता है तू और ऊपर से कहता है कि तुम गाँव वाले रिश्तो की अहमियत ज्यादा जानते हैं. ख़ूब अहमियत जानता है तू!
                        सब दोस्तों की झिड़क ने रोहित को एक बार सोचने पर मज़बूर कर दिया कि उसका दिमाग़ जो कह रहा था वह ग़लत था और उसका दिल हमेशा से सही था. अगले दिन रोहित कॉलेज नहीं आया. सभी दोस्त परेशान हो गए. सब रोहित के बारे में एक दुसरे से पूछने लगे और उसका फ़ोन भी लगाने लगे. रोहित का फ़ोन बज तो रहा था लेकिन कोई उसे उठा नहीं रहा था. सबको शक हुआ कि कहीं उनके कोसने के कारण रोहित ने कोई ग़लत क़दम तो नहीं उठा लिया. उन्होंने निश्चय किया कि कॉलेज की छुट्टी होने पर उसके कमरे पर जाकर पता करेंगे. दोपहर क़रीब दो बजे रोहित का बैक कॉल सन्नी के फ़ोन पर आया. पता चला, वह पटना में है और कविता के साथ फ़िल्म देखने गया था इसलिए फ़ोन साइलेंट था और कॉल रिसीव नहीं कर पाया. पिछले शाम को ही वह पटना के लिए निकल गया था, वह जल्दबाज़ी में किसी को ख़बर भी नहीं कर पाया था और अपनी ग़लती ख़ुद सुधारना चाहता था. यह सुन सभी दोस्त बड़े ख़ुश हुए.
                             इस कहानी को सात साल हो गए रोहित भैया और कविता भाभी अभी पटना में रहते हैं. रोहित भैया की वहीं बैंक में नौकरी हैं और कविता भाभी अपना कोचिंग एक बड़े पब्लिक स्कूल के रूप में बदल चुकी हैं. उनका एक बेटा अर्नव है और सुना है एक लड़की भी हुई है...
                                                              - © अरुण तिवारी ‘प्रतीक’
  


                              

 





Thursday, 30 January 2014

जब हम जवां होंगे...



“हाय, थक गया...ओफ्फ़ोह...उपर से ये इतनी गर्मी, अब भगवान् ही मालिक है. इस दिल्ली में रहना कितना मुश्किल है यार; बस का सफ़र-दिन भर की ड्यूटी-फिर बस का सफ़र. मैं तो उब गया हूँ इस लाइफ़ से...” ,हेमंत झल्लाता हुआ बोला. इतनी दूर चलने के बाद वह सीढियाँ चढ़ता हुआ चौथे फ्लोर पर पहुंचा था.
“अरे! धत तेरी की!! सुबह तो बर्तन भी धो कर नहीं गया था, वह भी धोने हैं, जूठन तो सूख गया होगा बर्तन में...खाना भी बनाना है. क्या बनाऊं?...चलो पहले कुछ देर सुस्ता लूं फिर सोचूंगा.” जैसे ही हेमंत ने ताला खोला उसे अचानक ध्यान आया की सुबह तो वह जल्दी में था, राशन के सामान की लिस्ट भी नहीं बना पाया था. सब्जी, आटा और सरसों तेल ख़त्म हो गया है, ख़रीद के लाना पड़ेगा. हेमंत पिछले साल ही एक किराये के कमरे में शिफ्ट हुआ था पहले वह हॉस्टल में रहता था लेकिन वहां खान-पान की ख़राब गुणवत्ता के चलते पापा के सुझाव पर अब वह अपने हाथ से बना कर खाने लगा था.
               फ़िलहाल, वह वैसे ही जूते पहने बस शर्ट को बदन से निकाल कर बगल में रखकर बिस्तर पर निढाल पड़ा था, शर्ट भी इसलिए निकाली थी क्योंकि परसों वही पहननी थी. उसने अपने बैग से मूंगफली का पैकेट निकाला और मूंगफली खाने लगा यह उसने आज ही लंच के टाइम में ख़रीदी थी जब मोहिका मैम के साथ मार्किट गया था. मोहिका मैम उसके ऑफिस में एच.आर.एम. हैं. दिखने में काफ़ी खुबसूरत हैं और कुंवारी भी. हेमंत को बड़ी प्यारी लगती हैं लेकिन दरअसल बॉस हैं इसलिए कुछ अधिक नहीं सोच पाता. लेकिन वह हेमंत को अच्छा और मेहनती एम्प्लोय समझती हैं और अब तो उनसे हेमंत की अच्छी ख़ासी पटने भी लगी है.
           हेमंत ने अपना लैपटॉप बैग से निकाला और उसे इन्टरनेट से कनेक्ट करता हुआ मूंगफली का स्वाद भी लेने लगा. दो दिन हो गए थे उसने फेसबुक लॉग इन नहीं किया था. क्योंकि उसे दो दिन तो समय ही नहीं मिला था. किसी नए कांसेप्ट पर प्रेजेंटेशन तैयार करने के चक्कर में वह रातों को ढंग से सो भी नहीं पाया था. फेसबुक के प्रोफाइल टूलबार पर 95 नोटिफिकेशन, 30 सन्देश और 5 फ्रेंड रिक्वेस्ट थे. हेमंत ने सबसे पहले फ्रेंड रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट कर लिया. पांच में से एक रिक्वेस्ट एक लड़की का था. हेमंत ने उत्सुकतावश उस लड़की का प्रोफाइल खोला. उसका नाम एंजेल रश्मि और उस पर फोटो बार्बी डॉल का था. उसके बारे में बस इतना लिखा था कि वह डी.पी.एस. कानपुर से पढ़ी है और अभी आई.आई.एम. अहमदाबाद से एम.बी.ए. कर रही है. पिक्चर सेक्शन में क़रीब सौ से अधिक फोटो थे लेकिन एक में भी किसी लड़की का फोटो नहीं था जिससे हेमंत कुछ अनुमान लगा सके. हेमंत ने इस प्रोफाइल पर ज्यादा मत्था मारने की कोशिश नहीं की. हाँ, लेकिन एक बात हेमंत को उस लड़की के बारे में जानने के लिए उत्तेजित कर रही थी वह थी उस लड़की का नाम. आज कल फेसबुक पर ट्रेंड है, लोग अपने नाम के आगे पीछे उलजलूल से शब्द जोड़ते रहते हैं जैसे- अंकित कूल, रॉकिंग प्रियंका, राहुल रॉक्स, एंजेल नीरज वगैरह-वगैरह. बहरहाल, हेमंत इसलिए बेचैन हो रहा था क्योंकि रश्मि एक ऐसा नाम था उसके लिए, जिसे वह कहीं दूर भी फुसफुसाती सी आवाज़ में सुनता तो उसका दिल एक बार को धक् से ज़रूर कर जाता. यह संवेदनशीलता एक बार उसके लिए घोर परेशानी का कारण बन गयी क्योंकि एक बार हेमंत के ऑफिस में रश्मि नाम की कलीग की जॉइनिंग हुई और उसे इसके बगल का ही केबिन ही मिला. अब जब भी कोई रश्मि को पुकारता हेमंत का ध्यान भटक जाता और वह कुछ देर के लिए बेचैन हो उठता. यह वाकया कुछ दिन तक चला, उसके बाद हेमंत ने ख़ुद का केबिन वहां से ट्रांसफर करवाकर डिपार्टमेंट के दुसरी साइड में ले लिया.
                                 रश्मि हेमंत के साथ क्लास छह से पढने आई थी. धीरे-धीरे इनमें दोस्ती हुई और फिर अच्छी पटने लगी. छठीं क्लास से पहले हेमंत अंतर्मुखी प्रकृति का लड़का था लेकिन रश्मि के आने के बाद वह खुला-खुला सा रहने लगा. अब उसके भी काफ़ी सारे दोस्त बन गए और वह सभी कॉम्पीटिशन में भाग लेने लगा. अब रश्मि और हेमंत एक दुसरे के होमवर्क और क्लासवर्क में मदद देने लगे. यह दोनों एक सिम्पल दोस्त से अब बेस्ट फ्रेंड बन गए थे. वह स्कूल-बस से एक साथ ही घर आते-जाते. रश्मि के घर से क़रीब दो किलोमीटर बाद हेमंत का घर पड़ता था. इनकी अच्छी वाली दोस्ती के बारे में इनके घर वाले भी वाकिफ़ हो गए थे. क्लास में सामने के बेंच पर बैठना, लंच में टिफ़िन शेयर करना और बैठ कर बातें करना, बस में साथ-साथ गाने गुनगुनाना, स्कूल में हमेशा साथ-साथ रहना, इंटर-स्कूल प्रोग्राम्स में साथ-साथ हिस्सा लेना, अब हेमंत और रश्मि को एक दुसरे का साथ बहुत अच्छा लगता था. अगर किसी दिन दोनों में से एक भी अब्सेंट हो जाता तो एक का मन नहीं लगता.
                  लेकिन कहते हैं कि ज़्यादा नज़दीकी, दूरियों का कारण बनती है. हेमंत और रश्मि इतने क़रीब हो गए थे कि वह अब एक दुसरे पर अपना हक़ जमाने लगे थे साथ ही साथ उनकी आपस में ख्वाहिशें भी बढ़ गयीं थीं. नौवीं क्लास के सालाना परीक्षा में रश्मि ने क्लास को टॉप किया जबकि हेमंत जो कभी उसके एक रैंक आगे या पीछे रहता था वह इसबार टॉप तीन रैंक में भी शामिल नहीं हो पाया था. यह बात उसे बुरी लगी लेकिन जब उसके कुछ क्लासमेट उससे मज़ाक कर रहे थे तो रश्मि ने हँस दिया. रश्मि की यह हंसी हेमंत को अच्छी नहीं लगी बल्कि उसके ज़ख्म पर नमक का काम कर गयी. हेमंत उस समय वहां से तो चुप-चाप निकल गया लेकिन उसके मन में रश्मि को लेकर गुस्सा भर गया. एक दिन वह  स्कूल में ही रश्मि से देर तक झगड़ता रहा और इसके बाद से उनके बीच बातचीत बंद हो गयी. यहीं से इनके दोस्ती के बीच में दरार आ गयी. इसी बीच रश्मि का बर्थडे आया उसे सबने विश किया लेकिन हेमंत की विशिंग नहीं आई. बर्थडे पार्टी में सारे दोस्त आये लेकिन हेमंत नहीं आया क्योंकि रश्मि ने उसे यह सोचकर इनवाईट नहीं किया कि कहीं वह मना न कर दे क्योंकि उसने तो उसका जन्मदिन विश भी नहीं किया था. इधर हेमंत के लिए यह बात सबसे ज्यादा शौकिंग थी कि उसकी बेस्ट फ्रेंड बनने वाली रश्मि ने उसे पार्टी में बुलाया तक नहीं. इस घटना के बाद अब दोनों में कोई भी सुलह नहीं हो सकती थी. यह ख़बर जंगल की आग की तरह फैल गई, इनके घर वाले भी इस बारे में जान गए और उन्होंने ने कोशिश की कि इनकी दोस्ती फिर रास्ते पर आ जाये मगर ऐसा नहीं हो सका.

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रात के 9:30 हो गए और हेमंत अभी भी फेसबुक से चिपका पड़ा था, बार-बार उस लड़की के प्रोफाइल को भी चेक कर ले रहा था और साथ ही साथ चैट बॉक्स के स्टेटस को भी. बीच-बीच में वह रश्मि के बारे में सोच कर ख्यालों में खो जाता. उसे इस नाम ने फिर परेशान कर दिया था और पुरानी बातें याद दिला दीं थीं. हेमंत सोचने लगा कि क्या मैं बचपन में रश्मि से प्यार करने लगा था? क्या वह भी मेरे को पसंद करती थी? हाँ पसंद तो करती ही थी अगर पसंद नहीं करती तो मेरे लिए उन लड़कों से झगड़ा क्यों कर बैठती जो मेरे पीठ पीछे मेरी बुराई कर रहे थे. अब भी याद है क्या बवाल खड़ा किया था उसने, टीचर को बुला लायी थी और उन्हें मुर्गा भी बनवाया था. उसकी क्लास में बहुत चलती थी, क्लास में क्या, स्कूल में भी उसकी खूब चलती थी क्योंकि स्कूल की सबसे होशियार और खुबसूरत लड़की तो वही थी ना, वैसे मैं भी कोई कम तो नहीं था. हाँ लेकिन तब बहुत मज़ा आता था जब सब लड़के मुझे देख कर जलते थे क्योंकि मेरी इतनी खुबसूरत और होशियार दोस्त थी. काश यह जो फ्रेंड रिक्वेस्ट आया है,मेरी रश्मि का हो तो कितना मज़ा आएगा. मेरी रश्मि...हाँ मेरी रश्मि, उसे मैं अपनी रश्मि कह सकता हूँ क्योंकि वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी. दोस्त...दोस्त तो तब तक थी जब तक कि उससे झगड़ा नहीं हुआ था, उसके बाद तो...
बीप...बीप की आवाज़ हुई और उसके फेसबुक टाइमलाइन के इनबॉक्स में एक मेसेज आया. हेमंत अचानक पुरानी खुबसूरत यादों से बाहर आ गया. यह मेसेज उसी एंजेल रश्मि का था, अब वह ऑनलाइन हो गई थी. मेसेज था- थैंक्स फॉर ऐडिंग मी, हाउ डू यू डू?
हेमंत के चेहरे पर एक मुस्कान बिखर गयी. उसने अब तक खाना नहीं खाया था और खाए भी कैसे, बनाया ही नहीं था और बनाये भी कैसे, सामान तो कुछ था ही नहीं. इस एंजेल रश्मि में अपनी रश्मि को ढूंढने चल पड़ा हेमंत उस मेसेज का जवाब देता हुआ बोला- इट्स ओके, मी फाइन एंड अबाउट उ? बाय द वे, क्या हम एक दुसरे को पहले से जानते हैं?
एंजेल रश्मि: नहीं तो, बट मुझे भी लगता है कि हम मिल चुके हैं?
हेमंत: फिर तुमने मुझे रिक्वेस्ट क्यों भेजा जब जानती नहीं तो?
एंजेल रश्मि: सॉरी फॉर दिस, वैसे मुझे लगा कि तुम अच्छे लड़के हो इसलिए मैंने भेजा. तुम चाहो तो ब्लाक कर सकते हो मुझे.
हेमंत: कोई बात नहीं, अब हम फ्रेंड बन ही गए हैं तो बातें करते हैं, क्यों???
एंजेल रश्मि: फ्रेंड कहाँ बने हैं अभी तो तुम ये नहीं जानते कि मैं कौन हूँ और या करती हूँ?
हेमंत: ऑफ़कोर्स जानता हूँ कि तुम रश्मि हो और कानपुर डी.पी.एस. से पढ़ी हो. अभी तुम आई.आई.एम.-ए से एम.बी.ए. कर रही हो और हम फेसबुक फ्रेंड हैं और क्या जानना ज़रूरी है?
एंजेल रश्मि: बस इतनी सी जानकारी से तुम मेरे दोस्त बन गए और कुछ भी जानते हो मेरे बारे में?
हेमंत: नो
एंजेल रश्मि: रियली???
हेमंत: याह, रियली.
एंजेल रश्मि: मिन्स, हेमंत यू रियली फॉरगॉट में, हाउ कैन यू डू दिस??
हेमंत: म...मैं समझा नहीं
एंजेल रश्मि: मतलब कि तुम उस रश्मि को भूल गए जिसे तुम अपना सबसे क़रीब और सबसे प्यारा मानते थे.
हेमंत: व्हाट? यू आर दैट रश्मि मिन्स माय रश्मि?
रश्मि: हे! डोंट से मी, माय रश्मि. झूठा शो ऑफ़ करने की ज़रूरत नहीं है, मैं जान गयी कि तुम जो कहते थे वो सब झूठ था. मैं तुम्हारी कुछ भी नहीं थी.
हेमंत: हे रश्मि! तुम ग़लत समझ रही हो. ऐसा कुछ भी नहीं है जो तुम सोच रही हो. आई रियली लव्ड यू
रश्मि: झूठ मत बोलो. तुम्हें सफाई देने की ज़रूरत नहीं है. और रही बात लव की तो वो तुम करते ही नहीं थे और अब तो और नहीं करते. करते तो चार साल हो गए, एक बार भी कांटेक्ट करने की कोशिश की?
हेमंत: डिअर, आई रियली लव यू. बट यू नो थोड़ी सी प्रॉब्लम थी इसलिए मैं तुम्हें  कांटेक्ट नहीं कर पाया.
रश्मि: चुप रहो, अब मेरा मुंह मत खुलवाओ. प्यार मुझसे करते थे और बंक मार कर डेट पर उस कलमुंही मॉडल के साथ जाते थे. स्टॉप लाइंग हेमंत.
रश्मि: क्यों क्या हुआ? रिप्लाई दो. मुझसे प्यार करते थे ना?? अब क्या हुआ???
हेमंत: डिअर, अभी तक तुम्हें उस बात पर विश्वास है मैंने तो तभी प्रूव कर दिया था, ऐसा कुछ नहीं था, शशांक ने तुम्हें मेरे खिलाफ भड़काया था क्यों कि वह तुम्हें पसंद करता था और वो चाहता था कि तुम मेरे बारे में ग़लत सोचो कि उसका काम बन जाये.
रश्मि: अच्छा वह तो मुझे पसंद करता था लेकिन कोयल भी मुझे चाहती थी क्या जिसने मुझे बताया था कि आज तुम उस मॉडल के साथ फ़िल्म देखने जा रहे हो.
हेमंत: कोयल, मुझसे चिढ़ती थी क्योंकि जब फिफ्थ क्लास में पढने आई थी तो उसका मेरा झगड़ा हो गया था और उसके बाद से तो तुमने भी देखा था कि वह मुझे टीचर से डांट पड़वाने के चक्कर में लगी रहती थी.
रश्मि: झूठे बहाने बनाने बंद करो. चीटर!
हेमंत: डिअर, मैं बहाने नहीं बना रहा, बिलीव मी.
रश्मि: ओके. अगर तुम मुझे प्यार करते थे तो फिर इतने दिनों तक कांटेक्ट क्यों नहीं किया, मेरा घर तो तुम्हारे घर से कोई खास दूर भी नहीं है.
हेमंत: तुम घर पर कहाँ थी? और तुम्हें मालूम नहीं कि क्या रूप होता था तुम्हारे पापा का मुझे देखकर, वो तो चबा जाते.
रश्मि: ओके एंड डोंट से माय पापा की वो चबा जाते, वो मैन ईटर नहीं हैं. एंड जब मैंने कांटेक्ट किया तब जाकर तुम्हें  मेरी याद आई और कहते हो आई रियली लव यू.
हेमंत: ओके डिअर, आई’म सॉरी, रियली रियली सॉरी. कान पकड़ के सॉरी, उठ बैठ के सॉरी. प्लीज़ फोरगिव मीइ इ इ इ इ इ इ......
रश्मि: ओके बाबा, बससस. माफ़ किया. आफ्टर आल, मैं जा रही हूँ डिनर करने. करना हो तो आ जाओ लेकिन मैं हॉस्टल में रहती हूँ. लड़कियों के बीच में बैठ कर खाना पड़ेगा.
हेमंत: नो प्रोब्लेम, मैं आ रहा हूँ, वेट...
रश्मि: ओके कमऑन हेमू...बाय गुड नाईट.
हेमंत: आई’म कमिंग   बाय....
दोनों फेसबुक से लॉग आउट हो गए. हेमंत को अचानक याद आया कि मैं तो बात करने के चक्कर में खाना ही भूल गया है और अब रात के दस से ऊपर हो गए हैं. इस समय अब क्या सामान खरीदने जाऊं, चलो खाना ही आर्डर कर देता हूँ...पिज़्ज़ा आर्डर कर देता हूँ क्योंकि आज उसे उसकी चाहत रश्मि मिल गयी थी और रश्मि जब भी खुश होती थी तो पिज़्ज़ा खाती थी स्कूल के दिनों में. हेमंत को अपने स्कूल के फिर वो सुनहरे दिन याद आ गए.

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हेमंत और रश्मि में झगड़ा होने के बाद उनके घर वालों  के साथ-साथ उनके दोस्तों ने भी काफ़ी कोशिश की लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. हाँ, अभी भी रश्मि के मन में हेमंत के लिए स्नेह और आकर्षण ज्यों का त्यों था लेकिन उसकी रुखाई रश्मि को आगे बढ़कर तनाव को कम करने से रोकती रही. वक़्त एक ऐसा मरहम है जो बड़े से बड़े ज़ख़्म को भर देता है. धीरे-धीरे हेमंत के मन में बैठी सारी घृणा धुलने लगी और अब उसे भी लगने लगा कि उसने रश्मि से दोस्ती तोड़ कर अच्छा नहीं किया है. हेमंत अब रश्मि से दोबारा दोस्ती करने के मौक़े तलाशने लगा. इसी बीच वे दसवीं क्लास पास कर गए. हेमंत ने अच्छा प्रदर्शन किया था और संयोग से इस बार वह रश्मि से तीन प्रतिशत ज्यादा नम्बरों से पास हुआ था. हालाँकि उसे यह बात मालूम नहीं थी कि रश्मि के नंबर उससे कम है.
''हेल्लो रश्मि! हाउ आर यू? मुझे लगता है कि हमें फिर से दोस्ती कर लेनी चाहिए बिकॉज़ मुझे तुम्हारे जैसे दोस्त की कमी फील होती है...फ्रेंड्स???'' ,हेमंत रश्मि के तरफ हाथ बढ़ाते हुए बोला.
"गुड! वैरी गुड!! तुम यह क्यों नहीं कहते कि तुम्हें एक ऐसे दोस्त की ज़रूरत है जिसके नंबर तुमसे कम है और तुम उसपर अपना रोब जमाना चाहते है. मुझे तुम्हारी दोस्त बनने की ज़रूरत नहीं है, तुम्हारे तो बहुत सारे दोस्त हैं" ,रश्मि को लगा कि हेमंत पिछले साल की कसर पूरी करने के लिए आया है कि जब उसके नंबर उससे कम आए थे.
"रश्मि, मेरा कुछ ऐसा इरादा नहीं है. यू आर माय फ्रेंड. और मुझे नहीं मालूम कि तुम्हारे नंबर कितने हैं" ,हेमंत सफाई देता हुआ बोला.
"डोंट बी सिली हेमंत. भोला बनने की ज़रूरत नहीं है. जाओ बहुत सारी लड़कियां हैं उनसे दोस्ती कर लो, तुम तो घूमा करते हो न उनके साथ." ,रश्मि आगे बढती हुई बोली.
हेमंत को बड़ा बुरा लगा लेकिन ख़ुद पर गुस्सा भी आया कि वह बेकार में चला आया उससे उस समय दोस्ती करने जब वह इस बात से परेशान है कि उसके नम्बर अच्छे नहीं आये हैं. लेकिन हेमंत ने अपना प्रयास नहीं छोड़ा, वह भी उसी तरह रश्मि का पीछा करने लगा जैसे पिछली साल रश्मि ने उसका किया था. इधर रश्मि हेमंत से बदला लेना चाहती थी. इसलिए उसने एक अपने ही क्लास के लड़के मनीष से जो पैसे वाले घर से था और बदमाश भी, उससे दोस्ती कर ली. यह बात हेमंत के लिए नागवार गुजरी. अब वह और बेचैन रहने लगा. अब उसके मन में कोई और ही भावना जागने लगी थी. यानि कि वह शायद रश्मि को चाहने लगा था और किसी भी तरह से उसे पा लेना चाहता था. उसके इस पागलपंथी का ख़ुलासा सबके सामने हो गया और कुछ ऐसे तरीक़े से जैसा कि रश्मि ने कभी नहीं सोचा था और ना ख़ुद हेमंत ने भी.
          हुआ यों कि स्कूल में टिफ़िन की छुट्टी हुई थी और सारे बच्चे बाहर फील्ड में थे. सब अपने खेल-कूद और खाने में व्यस्त थे. इधर रश्मि क्लास में ही बैठी थी और मनीष और उसके दोस्तों के साथ गप्पे लड़ा रही थी. रश्मि मनीष के कुछ ज्यादा ही क़रीब बैठी थी जिसका शायद फ़ायदा वह उठाने की कोशिश कर रहा था हालाँकि रश्मि को अभी ऐसा कुछ मालूम ना चला था. हेमंत भी गनीमत से उस क्लासरूम में जा पहुंचा. वह यह दृश्य देखकर गुस्से से तमतमा उठा. वह तेज़ी से आया और रश्मि को वहां से खीचकर उठाता हुआ बोला, “रश्मि, डोंट डू लाइक दिस.”
“क्या ऐसा मत करो और तुमने मुझे ऐसे खींचने की हिम्मत कैसे की.” ,रश्मि उससे अपना हाथ छुड़ाती हुई बोली.
“मुझे मत तड़पाओ, मुझसे दोस्ती कर लो प्लीज, वरना मैं कुछ उल्टा-सीधा कर दूंगा.” ,हेमंत बोला.
“उल्टा-सीधा क्या कर दोगे और तुम्हारी औकात क्या है कि तुम मेरी दोस्त से इस तरह बिहैव करोगे.” ,मनीष बीच में पड़ते हुए बोला.
“तू चुप रह साले, बीच में पड़ेगा तो बहुत ग़लत होगा...”
“रश्मि प्लीज, मेरे से दोस्ती कर लो, प्लीज.”
“हेमंत तुम्हें क्या हो गया है. तुम पागल तो नहीं हो गए हो. चलो ठीक है, मैं तुमसे दोस्ती कर लेती हूँ लेकिन तुम आगे से इस तरह बीहैव नहीं करोगे.”
“ओये पागल, अब जा, अब क्या खड़ा है? रश्मि ने कह दिया न कि उसने तेरे से दोस्ती कर ली. अब निकल...साला कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं?” ,मनीष के साथ वाला लड़का रोब से बोला.
“अबे पागल किसे बोला बे, पागल किसे बोला तूने, तू पागल-तेरे दोस्त पागल, तेरे माँ की...” हेमंत के सर पर आज जूनून सवार था, वह उस लड़के से उलझता हुआ.
“साले मैं चुप हूँ तो तू बोले जा रहा है, तू इतना उछल क्यों रहा है? जा रश्मि नहीं करेगी तेरे से दोस्ती, अब उखाड़ के दिखा, क्या उखाड़ता है??” मनीष बीच में पड़कर झगडा छुड़ाता हुआ बोला.
“अबे बहन की आँख, तू ज्यादा जानता है, रश्मि मेरे से दोस्ती भी करेगी और प्यार भी क्योंकि मैं रश्मि से प्यार करता हूँ, आई लव रश्मि.” हेमंत लगभग चिल्लाता हुआ बोला.
एक मिनट के लिए पुरे कमरे में ख़ामोशी फैल गयी.
रश्मि कुछ बोलती इससे पहले बेल बज गयी और सारे बच्चे कमरे में आने लगे. सारी बातें यहीं पर रह गयीं. मनीष ने स्कूल की छुट्टी के बाद हेमंत से उलझने की कोशिश की लेकिन रश्मि ने उसे रोक दिया. हेमंत भी अचरज में था कि उसने रश्मि से यह बोल कैसे दिया और उसने तो कभी सोचा नहीं था कि वह रश्मि से प्यार भी करता है. यह पूरी बात एक मिनट में ही आई और गई लेकिन रश्मि को यह बात लग गई. कई दिनों तक रश्मि गुमसुम रही और अब वह मनीष और उसके दोस्तों के साथ भी नहीं घुमती थी, ना ही उसने हेमंत से कुछ कहा. हेमंत ने काफ़ी कोशिश की कि वह उस दिन के बात के लिए रश्मि उसे माफ़ कर दे लेकिन रश्मि तो उससे बात करने को भी तैयार नहीं थी. स्वतंत्रता दिवस आने वाला था. ग्यारहवीं के क्लास टीचर ने सारे स्टूडेंट्स से किसी ना किसी एक्टिविटी में हिस्सा लेने के लिए कहा क्योंकि इसबार का आयोजन उनके जिम्मे ही था. सातवीं और आठवीं घंटी में रिहर्सल होना तय हुआ. बच्चों का नाम बुलाया जाने लगा कि फलां बच्चे ने फलां चीज़ में हिस्सा लिया है. हेमंत का नाम बुलाया गया और साथ में रश्मि का भी, कृष्णा और राधा के डांस शो के लिए. हेमंत आश्चर्यचकित था कि उसने तो नाम लिखवाया नहीं फिर उसका नाम क्यों बोला गया. जल्दी ही उसका आश्चर्य ख़ुशी में बदल गया क्योंकि यह नाम रश्मि ने लिखवाया था. यह रश्मि और हेमंत के बीच प्यार की शुरुआत थी. कभी उनकी दोस्ती के चर्चे स्कूल में गूंजते थे और अब उनके प्यार के बारे में उनके क्लासमेट बातें करने लगे थे. मनीष अब दूर खड़ा हेमंत को देख कर बस जलता-भुनता रहता था क्योंकि उसकी दाल कोई और गला ले गया था. ग्यारहवीं में शुरू हुआ प्यार बारहवीं में आते-आते कब परवान चढ़ गया मालूम ही न चला.
                       कहते हैं इश्क़ और मुश्क़ छुपाये नहीं छुपते, सो छुप नहीं पाए और इसकी ख़बर उनके घर वालों को चली. घर वालों के तरफ से उन्हें समझाने के दौर चलने लगा. जैसा हर मुहब्बत के क़िस्से में होता है पहले डांट-फटकार फिर मान-मन्नौवल और फिर लालच. बात इसपर भी नहीं बनी सो मामला स्कूल तक पहुंचा  और इन्हें दूर-दूर रखा जाने लगा. बारहवीं की बात थी सो स्कूल बदला नहीं जा सकता था इसलिए टीचर ध्यान देने लगे और इन्हें पास बैठने नहीं दिया जाता था, साथ घुमने नहीं दिया जाता था. और एक गाने के अनुसार, ‘जब-जब प्यार पे पहरा हुआ है, प्यार और भी गहरा हुआ है’. ये एक दुसरे को मिलने के लिए और बेकल होने लगे. कभी स्कूल में आसानी से मिल जाने वाले अब बंक मारने के फिराक़ में लग गए. इससे इनकी पढाई भी थोड़ी सी चौपट होने लगी. कहावत है कि पानी को ख़ुद ही बहने दो अगर उसे बांध बनाकर रोकने की कोशिश करोगे तो वो एक दिन बाँध तोड़ेगा ही. ऐसा ही हुआ एक बार वो बंक मार के गए थे और पार्क में पकड़े गए. दोनों का स्कूल बंद और घर पर ही होम ट्यूटर लगवा दिया गया. संवाद के सारे साधन टेलीफोन, मोबाइल इनकी पहुँच से दूर कर दिए गए. लेकिन फिर इनकी चाहत ने एक नया रास्ता ढूंढ निकाला और इन दोनों के घर अख़बार देने वाला इन्हीं की उम्र का एक लड़का इनके प्यार का सन्देश पहुँचाने वाला कबूतर बन गया. वह हेमंत के दिल का हाल रश्मि को और रश्मि के दिल का हाल हेमंत को पहुँचाने लगा. धीरे-धीरे समय बीता, इनकी परीक्षाएं हुईं और इश्वर की दया से यह दोनों पास हो गए. लेकिन अब समय और इनकी क़िस्मत इनके खिलाफ़ हो गयी. वह अख़बार वाला लड़का अब दुसरे एरिया में अख़बार देने लगा था और ये जब एक दुसरे से दूर हुए तो आपस में ये एक दुसरे को बता भी नहीं पाए थे कि ये कहाँ पढने के लिए भेजे जा रहे हैं और ये एक दूसरे को कैसे संपर्क कर पाएंगे. फिर आपस की दूरी और समय के चक्र ने इनके प्यार के उस तेज़ धार को भी कुंद कर दिया जो इन्हें कभी यहाँ तक की क़समें दिलवा चूका था कि वो एक दूजे के बिना मर भी नहीं सकते जिंदा रहना तो दूर रहा .

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“अरे! साढ़े ग्यारह हो गए, अब तो रेस्टोरेंट भी बंद हो गए होंगे.” आज हेमंत को प्यार पाने की ख़ुशी में भूखा ही सोना पड़ेगा.
सुबह देर से नींद खुली. हेमंत जल्दी से तैयार हुआ और ऑफिस को निकल गया. देखा आज मोहिका मैडम कुछ ज़्यादा ख़ुश दिख रही थीं. हेमंत के जाते ही उन्होंने उसे सरप्राइज दिया कि आज सीनियर बॉस ने उन्हें ख़ुश होते हुए बताया कि उनका इन्क्रीमेंट होने वाला है और अगले महीने से वो इस ब्रांच की सीनियर मेनेजर के पोस्ट पर प्रमोट हो जाएँगी. यह वाकई ख़ुशी की बात थी और वह इस ख़ुशी को अपने फेवरेट एम्प्लोयी हेमंत के साथ बाँटना चाहती थीं. उन्होंने उसे ऑफिस के बाद उनका इंतज़ार करने बोला. हेमंत ख़ुश भी हुआ और आश्चर्यचकित भी कि मैम ने मुझे ही क्यों कहा अपने साथ जाने के लिए, ज़रूर कोई बात है. वह मन ही मन बेचैन हो रहा था और अपनी क़िस्मत को दाद भी दे रहा था कि वह तो उसपर पर छप्पर फाड़ कर मेहरबान है क्योंकि उधर मुझे कई सालों बाद रश्मि मिल गयी और इधर कई सालों की मेहनत रंग लाने लगी है. दिन भर हेमंत का मन काम से भटकता रहा.
शाम को वह अपने काम को जल्दी निपटा कर मोहिका मैम का वेट करने लगा. मैम भी बताये समय पर आईं और हेमंत के साथ रेस्टोरेंट को निकल पड़ीं. आज मोहिका मैम काफ़ी खुबसूरत लग रही थीं. हेमंत से रहा नहीं गया और उसने मैम की तारीफ़ कर ही डाली, “मैडम आप अच्छी लग रहीं हैं.”
“थैंक यू. एंड डोंट से मी मैम हियर. कॉल मी मोहिका. ऑफिस में मैं तुम्हारी मैडम हूँ, ओके, गोट ईट?”
“सॉरी मोहिका...” ,हेमंत हँसते हुए बोला.
“हेमंत, डू यू वाना बुज़?” मैडम अचानक रुख चेंज करती हुई बोलीं.
हेमंत एक बार को अचकचा गया कि मैम यह क्या पूछ रही हैं. अपना गला साफ़ करता हुआ बोला, “य..यस...बट व्हाट...?
“डोंट से यस एंड व्हाट. लेट्स एन्जॉय. मेरी ख़ुशी से तुम ख़ुश नहीं हो?” मैम ने इस लहज़े में बोला कि वह जैसे पहले से ही दो बोतल पी कर टुन्न हों. फिर उन्होंने हेमंत को साथ लिया और दिल्ली के कनाट प्लेस के पास एक क्लब को हो लिया. मैडम अपनी प्रोमोशन की ख़ुशी से इतनी उतावली हो रही थीं कि कितना बोतल ख़ाली कर गयीं थीं उन्हें मालूम ना चला.
रात के क़रीब 10 बजने को थे और इधर मैडम पर नशे का ख़ुमार चढ़ रहा था, उनके घर से फ़ोन आया और उन्होंने उसे रिसीव भी नहीं किया.
“मैडम अब चलिए. इट्स एनफ. आप एकदम टुन्न हो गयीं हैं. मुझे आपको आपके घर ड्राप करना पड़ेगा.” ,हेमंत मैडम को झकझोरता हुआ बोला. उसने भी पी थी लेकिन इतना कि होश में रह सके. उसे इधर रश्मि से बात करने की चिंता हो रही थी क्योंकि वह शायद इसी समय ऑनलाइन होती थी.
“हे हेमंत! डोंट कॉल मी मैडम. से मी मोहिका माय डिअर स्वीट हेमू. एंड यू नो आई लाइक यू वैरी मच, वैरी-वैरी मच.” मोहिका मैडम अपने होश में नहीं थी और उलजलूल बातें कर रही थी ऐसा ही कुछ हेमंत को लगा. लेकिन मैडम ने अचानक ख़ुद को संभाला और गंभीर होते हुए बोली, “हेमंत, टेक ईट सीरियस. आई रियली लाइक यू एंड आई विल वांट टू लव यू.”
“मैडम, अभी आप होश में नहीं हैं, चलिए आपको घर छोड़ देता हूँ.” ,हेमंत उन्हें सहारा देते हुए क्लब से बाहर ले आया.
उन्हें वह उनकी कार में ही घर छोड़ आया. ख़ुद उनके घर से ऑटो पकड़ा और जब तक घर पहुंचा रात के बारह बजने वाले थे. वह जल्दी से कपड़े बदल कर फेसबुक में लॉग इन किया. उसने रश्मि के दो मेसेज देखे. एक में उसने उसे ग्रीट किया था और दुसरे में उससे पूछा था कि दिन भर कहाँ ग़ायब थे और अपनी कोई अच्छी सी पिक्चर क्यों नहीं लगते फेसबुक पर. अभी वह ऑफलाइन थी. हेमंत को यह बात अच्छी नहीं लगी आज उसे उसकी रश्मि से बात करने का मौक़ा नहीं मिला लेकिन इस बात को लेकर उसके मन में बेचैनी थी कि क्या मैडम सच में ऐसा सोचती है जैसा वो पीने के बाद उससे कह रही थी. फिर उसे एक फिल्म का सीन याद आ गया जिसमे एक हीरो शराब पी लेने के बाद अपने दिल की सारी बातें कह देता है जो वह होश में कहने से कतराता है. इसी सोच और उहापोह में वह करवटें बदलता रहा और उसे क़रीब रात के ढाई-तीन बजे नींद आई.
अब हेमंत के दिन फ़िरने लगे थे. कभी वह रश्मि के चले जाने के बाद से पांच साल तक बिलकुल अकेला हो गया था वहीँ उसे अब दो-दो खुबसुरत लड़कियों का साथ मिलने लगा था. कहते हैं कि इन्सान एक साथ कई काम बखूबी ढंग से नहीं कर सकता और पुरुष तो और नहीं, वह एक ना एक काम के तरफ़ ज़्यादा झुक ही जाता है. ऐसा ही कुछ हेमंत के साथ हुआ. उसे मोहिका मैडम भी पसंद करने लगीं थीं और रश्मि से उसकी ख़ूब बातें होती थीं. अब इस आपा-धापी में किसी एक का नुकसान तो होना ही था सो हेमंत रश्मि के ध्यान में पड़कर मोहिका मैडम को कम स्पेस देने लगा. अभी कुछ दिन पहले ही शुरू हुए इस अघोषित प्रेमकहानी में एक नया ट्विस्ट आने लगा. पहले मोहिका को लगा कि हेमंत शायद काम को लेकर बिज़ी है इसलिए उसे कम स्पेस दे पा रहा है लेकिन एक दिन जब उन्होंने ख़ुद को इगनोर किये जाने का कारण पूछा तो हेमंत ने यह कहकर उसे समझाने की कोशिश की कि उसे एक लड़की रश्मि से पहले से ही इश्क़ है जो उसके बचपन का प्यार है. यह बात मोहिका मैडम के लिए असहनीय थीं. उन्हें अचानक सब कुछ ख़ाली सा दिखने लगा और यह हेमंत उनका दुश्मन बन गया जो कभी उनका प्यार था. मोहिका ने बड़ी कोशिश करके ख़ुद के दिल से हेमंत को निकालने की कोशिश करने लगीं लेकिन इसमें वह बार-बार नाकामयाब हो जाती थीं लेकिन इन सब बातों का हेमंत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि वह तो किसी और के चाहत था.
 इधर वह रश्मि के लिए सतरंगी सपने बुनने लगा जिसमें वह और रश्मि में थे बाकी और कुछ भी नहीं था. मोहिका को मन करने के क़रीब दो तीन दिनों के बाद की बात है. हेमंत रात को बैठा रश्मि से फेसबुक पर चैट कर रहा था. उसने अपने बातों का रुख मोड़ते हुए रश्मि को अपने और मोहिका मैडम के बीच हुए वाकये को बताने लगा. वह हर बात बताते जाता और रश्मि बड़े ध्यान से सुनती रही.
रश्मि: तो तुमने मोहिका को मना कर दिया कि तुम उसे प्यार नहीं करते. अच्छा झूठ बोल लेते हो. तुमने उसकी फोटो भेजी है और वह सुन्दर तो है. वेल...अगर तुम उसे नहीं पसंद करते तो फिर किसे करते हो?
हेमंत: करता हूँ एक खुबसूरत लड़की को जो मोहिका से भी ज़्यादा सुन्दर है.
रश्मि: ह्म्म...म्म...???
हेमंत: जिससे मैं चैट कर रहा हूँ वो है और कौन है.
रश्मि: व्हाट ???
हेमंत: यस, आई रियली लाइक यू एंड आई लव यू.......
रश्मि: तुम पागल हो, मुझे प्यार करते हो, दिमाग तो नहीं खिसक गया है तुम्हारा.
हेमंत: यह कैसी बात कर रही हो. तुम भी तो मुझे प्यार करती हो?
रश्मि: नो हेमंत, वी आर जस्ट फ्रेंड्स. और मैंने तुम्हारे बारे में कुछ ऐसा नहीं सोचा और फिर मैं तुम्हें क्यों प्यार करने लगी.
हेमंत: तो वो फिर जब हम स्कूल में थे वह क्या था?
रश्मि: डफर, वो हमारे स्कूल डेज थे और उसको लेकर तुम बैठे रहोगे. तुम मेरे दोस्त हो अच्छे वाले.
हेमंत: डोंट टेल अ लाई. यू लव मी और तुम मेरे से मज़ाक कर रही हो.
रश्मि: हेमंत, पागल मत बनो. मैं तुम्हें  प्यार नहीं करती और करती भी थी तो हम नादान थे. नाउ वी आर मेच्यौर.
हेमंत: हाउ कैन यू से कि वो बचपन था. तो फिर तुमने मुझे कांटेक्ट क्यों किया जब तुम्हें  मेरी याद आई तभी तो तुमने मुझे ढूंढा.
रश्मि: ओ एम जी. कोई अपने दोस्त को नहीं ढूंढ सकता बस उसे ही ढूंढेगा जिसे वह प्यार करता है.
रश्मि: शायद मेरी ही ग़लती थी कि मैंने तुम्हें बताया नहीं था.
हेमंत: क्या बताया नहीं था?
रश्मि: तुम मि. राहुल अरोड़ा को जानते हो, जो तुम्हारे कंपनी में नए मार्केटिंग मेनेजर हैं और उनकी अभी पांच- छह महीने पहले ज्वाइनिंग हुई है.
हेमंत: हाँ, उनकी मुझसे बड़ी अच्छी पटती है उनके आने के एक महीने बाद ही तो उनके चलते मेरा प्रमोशन हो गया था. तो उनसे क्या मतलब है??
रश्मि: वो मेरे से एक साल सीनियर थे मेरे कॉलेज में और वो मेरे बॉयफ्रेंड हैं और उन्होंने ने मेरे घर वालों से बात कर ली है बस उनके घर से अप्रूवल आना है फिर हमारी शादी हो जायेगी
हेमंत:__________
रश्मि: क्या हुआ? टेंशन मत लो, तुम्हारे बॉस की बीवी बन कर आ रही हूँ तुम्हारा प्रमोशन तो करवा ही सकती हूँ.
हेमंत: हम्म...म्म...
हेमंत: कान्ग्राचुलेशन...शादी की बधाइयाँ.
रश्मि: थैंक यू डिअर हेमू...
रश्मि: तुम बताओ, तुम्हें कैसी लड़की चाहिए. शायद मेरे जैसी ही पसंद होगी. और तुम कब शादी करने जा रहे हो???
रश्मि: व्हाट हैपेण्ड...ऑफलाइन हो गए क्या??
                  अब हेमंत कोई भी जवाब देने के मूड में नहीं था, उसने लैपटॉप ऑफ किया. जैसे उस दिन वह रश्मि से मिलने की ख़ुशी में बिना खाए सो गया था वैसे ही आज उससे बिछड़ने के ग़म में भी भूखे पेट ही सोने की कोशिश करने लगा. इसी जद्दोजहद में उसने अपने फ़ोन का रेडियो ऑन किया. शायद कोई रेडियो स्टेशन अस्सी के दशक के गाने बजा रहा था. हेमंत आँखे बंद किये गाने को सुनाने लगा, उसे महसूस करने लगा और गुनगुनाने लगा ‘जब हम जवां होंगे, जाने कहाँ होंगे लेकिन जहाँ होंगे...’

                                                                      - © अरुण तिवारी ‘प्रतीक’.